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मजदूरी नहीं ये मजबूरी है... मैनेजर खोद रहे गड्ढा, सुपरवाइजर ढो रहे ईंट

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चिरगांव क्षेत्र में चकरोड बनाने के काम में लगे मनरेगा मजदूर। - फोटो : DEHAT
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झांसी। लॉकडाउन ने मजदूरों को ही मजबूर नहीं किया, एक से एक अनुभवी कुशल मैनेजर और तकनीशियन को भी मजदूरी करने को मजबूर कर दिया है। लॉकडाउन के कारण देश के महानगरों से आए पढ़े लिखे और कुशल श्रमिकों को अपने गांव में मनरेगा के तहत गड्ढा तक खोदना पड़ रहा है। वे ईंट भी ढो रहे हैं। इनमें कई तो बड़ी कंपनियों में मैनेजर, सुपरवाइजर, ऑपरेटर थे। दर्द साझा करते हुए बताया कि टाई लगाकर ऑफिस जाते थे। अच्छा वेतन पाकर ठाठ से रहते थे। इनके बच्चे भी इंगलिश मीडियम स्कूलों में पढ़ते थे। उन्हें लिफ्ट से चढ़ने-उतरने और बसों से स्कूल जाने की आदत है। आज उन्हें यह भी नहीं पता कि वे कैसे और कहां पढ़ेेंगे। वो समझ नहीं पा रहे हैं कि उनके स्मार्ट पापा अब मैले, कुचले कपड़ों में मुरझाए चेहरे के साथ घर क्यों लौट रहे हैं...। दो-चार नहीं, झांसी-ललितपुर में ऐसे लोगों की संख्या हजारों में है।
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अमर उजाला टीम की पड़ताल में मनरेगा के तहत काम कर रहे लोगों का दर्द उनकी जुबां पर आ गया। झांसी में मऊरानीपुर क्षेत्र के इटायल निवासी कौशल ने बताया कि वह बद्दी हिमाचल प्रदेश में हर्बल इंडिया लिमिटेड कंपनी में अस्सिटेंट सुपरवाइजर पद पर कार्यरत था। लॉकडाउन की वजह से बेरोजगार होने पर घर लौटना पड़ा। कौशल ने बताया कि आज उनके पास न कोई काम है और न ही पैसा। आकाश ने बताया कि वह गणित से बीएससी हैं। बस्किन रोविन्स कंपनी दिल्ली में स्टोर मैनेजर के पद पर कार्यरत थे। अब बेरोजगार हैं। गांव में मनरेगा के अतिरिक्त कोई कार्य है नहीं। भविष्य अंधकार में नजर आ रहा है।
अवधेश ने बताया कि उन्होंने बीए के साथ ही इलेक्ट्रॉनिक्स से आईटीआई किया है। हरिद्वार की माइक्रो टर्नर कंपनी में सीएनसी ऑपरेटर के पद पर कार्यरत थे। उन्हें अच्छी खासी सैलरी मिलती थी। गांव आने के बाद बेरोजगार हैं। अब मनरेगा में मजदूरी के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं है। आशीष ने बताया कि वह पुणे महाराष्ट्र में एक्रब प्राइवेट कंपनी में ऑपरेटर के पद पर नौकरी कर रहे थे। अचानक हुए लॉकडाउन के कारण जैसे-तैसे घर पहुंचे। अब बेरोजगार हैं, गांव में ही काम करना पड़ रहा है। चिरगांव के ग्राम अम्मरगढ़ के करन सिंह ने बताया कि वह दिल्ली में एक कपड़ा फैक्ट्री में असिस्टैंट मेनेजर के पद पर कार्यरत थे उन्हें सोलह हजार रुपये बेतन मिलता था, लेकिन कोरोना ने उन्हें गड्ढा खोदने पर मजबूर कर दिया है। यहीं के भगवानदास सूरत में कपड़ा कंपनी में काम करते थे। इन दोनों के जॉबकार्ड हाल ही में बनाए गए हैं।
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ललितपुर के धर्मेश ने बताया कि वे मुंबई में प्लास्टिक कंपनी में मशीन चलाते थे, लेकिन अब रोजगार छिन गया है। इसलिए मनरेगा के अंतर्गत काम करना पड़ रहा है। लोकेंद्र ने बताया कि वह अहमदाबाद में सिक्योरिटी गार्ड का काम करते थे। लॉकडाउन के कारण वापस आना पड़ा। यहां आय का कोई दूसरा साधन नहीं था। इस कारण मनरेगा में काम करना पड़ रहा है। राजेश कुशवाहा ने बताया कि मुंबई में रहकर डलिया बनाने का काम करते थे। रोजगार छिन जाने के कारण वापस लौटना पड़ा। अब यहां पर मनरेगा का ही सहारा है। लेकिन, खुशी है कि वापस आने पर काम मिल गया है।
खास बात
- ललितपुर में अब तक बाहर से 9350 श्रमिक आए और 8054 मनरेगा में काम कर रहे हैं। इनमें 1296 हुनरमंद हैं
- मनरेगा के अंतर्गत तालाबों की खुदाई पर जोर दिया जा रहा है। इसके अलावा चेकडैम भी बनाए जा रहे हैं। ललितपुर में मनरेगा के अंतर्गत 113 चेकडैम, 86 तालाब के अलावा बंधी, नाला सफाई और कुओं की खुदाई चल रही है। जुलाई में होने वाले पौधरोपण के लिए गड्ढे भी खोदे जा रहे हैं।
कोट
मनरेगा के अंतर्गत जॉब कार्डधारकों को लगातार काम दिया जा रहा है। इनमें प्रवासी मजदूर भी शामिल हैं। जो भी काम की डिमांड कर रहा है और जॉब कार्ड बनवाया जा रहा है, खंड विकास अधिकारी के माध्यम से यह काम तत्काल किया जा रहा है। - इंद्रमणि त्रिपाठी, उपायुक्त श्रम व रोजगार
रिपोर्ट: ललितपुर से सुनील सुल्लेरे, मऊरानीपुर से प्रमोद कुमार सिंह, चिरगांव से राजेंद्र जैन, मोंठ से अरविंद दुबे, पूंछ से विकास अग्रवाल, टहरौली से रिंकू दीक्षित, गरौठा से बालादीन राठौर
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