बुंदेलखंड में सर्पदंश को लेकर यह धारणा है या कहें कि अंधविश्वास है कि सांप के डसने के बाद पीड़ित व्यक्ति अगर उस सांप को मार देता है तो उसका जहर फैलता नहीं है और जान बच जाती है। शुक्रवार रात को एक युवक इसी अंधविश्वास में अपनी जान गवां बैठा। निवाड़ी कोतवाली के असाटी गांव निवासी ठाकुरदास केवट (28) पुत्र काशीराम खेती-किसानी करता था। परिजनों ने पुलिस को बताया कि शुक्रवार रात करीब आठ बजे ठाकुरदास खेत पर सो रहा था। उसी समय एक विषैले सर्प ने उसके पैर में डस लिया।
सांप के डसने के बाद ठाकुरदास की नींद खुल गई। उसने सांप को भागते हुए देख लिया और शोर मचाकर आसपास के खेतों पर सो रहे लोगों को बुला लिया। इसके बाद ठाकुरदास इलाज और दर्द को भूलकर अंधविश्वास के चलते सांप को मारने के लिए ढूंढने लगा। करीब एक घंटे तक ठाकुरदास सांप को तलाश करता रहा। एक बिल में उसे सांप नजर आया। उसने सांप को बिल से बाहर निकालकर मार डाला।
इधर, सांप के डसने के बाद ठाकुरदास के शरीर में जहर फैलने लगा और वह अचेत हो गया। सूचना पर परिवार के लोग भी पहुंच गए। परिजन उसे लेकर गांव में ही तांत्रिक के पास चले गए। काफी देर तक वह झाड़-फूंक करता रहा, लेकिन उसकी हालत बिगड़ती जा रही थी। तांत्रिक के हाथ खड़े कर देने पर देर-रात परिजन उसे लेकर मेडिकल कॉलेज पहुंचे। यहां उसकी मौत हो गई। पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम कराया है। परिवार में पत्नी भारती समेत पांच साल का पुत्र एवं दो साल की पुत्री है। ठाकुरदास ही परिवार का इकलौता कमाने वाला था। परिवार में अब कमाने वाला भी कोई नहीं बचा।
झांसी में हर सप्ताह दो से तीन मौतें
सर्पदंश के मामलों में झांसी में हर सप्ताह दो से तीन मौतें अंधविश्वास के चलते होती हैं। सांप के डसने के बाद लोग इलाज कराने के बजाय झाड़-फूंक कराने वालों के पास मरीज के लेकर पहुंचते हैं। तांत्रिक जब हाथ खड़े कर देता है तो इलाज के लिए मेडिकल कॉलेज और अस्पताल लाते हैं। झाड़-फूंक के चलते इलाज मिलने में देरी होने से पीड़ित की मौत हो जाती है।