महारानी लक्ष्मीबाई की शौर्य गाथा के प्रतीक चिह्न आखिर कब मिलेंगे झांसी को
अंतिम सांस तक जिस तलवार से बाईसा ने फिरंगियों से लिया लोहा वह आज भी ग्वालियर संग्रहालय में है कैद
18 जून को वीरांगना की 163वीं पुण्यतिथि पर फिर याद करेगी झांसी की धरती
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। महारानी लक्ष्मीबाई की शौर्य गाथा की साक्षी झांसी की धरती 18 जून को अपनी बाईसाब की 163वीं पुण्यतिथि मनाएगी। झांसी की रानी की जिस वीरता के किस्से बुंदेलखंड के गांव चौपालों पर सुनाए जाते हैं, उस युद्ध से जुड़े वीरता के प्रतीक चिह्न अब तक झांसी नहीं मिल सके हैं। महारानी जिस तलवार से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं थी, वह तलवार और ढाल आज भी ग्वालियर में सिंधिया राजघराने के संग्रहालय में कैद हैं। इन्हें झांसी लाने के प्रयास कई बार किए गए पर सफलता अब तक नहीं मिली है।
स्वर्ण रेखा नाले पर नये घोड़े के अड़ जाने से महारानी अंग्रेजों की टुकड़ी से घिर गईं थीं, पर अंतिम समय में भी फिरंगी उन्हें छू नहीं सके। रानी की इच्छा थी कि जीते जी और मरने के बाद भी उनका शरीर अंग्रेज नहीं छू पाएं। उनकी इस इच्छा को अंत समय में उनके साथ मौजूद भरोसेमंदों की टोली ने पूरा किया। उनके विश्वासपात्र उन्हें घायल अवस्था में बाबा गंगादास की कुटिया में ले गए। उसकी कुटी में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। अंग्रेजों को इसकी भनक बहुत देर बाद लगी। महारानी लक्ष्मीबाई को अंग्रेज छू तो नहीं सके पर बाद में उनके शस्त्रों को जरूर फिरंगियों ने कब्जे में लेकर अपने मित्र सिंधिया को सौंप दिए थे, जो अब तक ग्वालियर में ही हैं। झांसी शस्त्र लाने के लिए कई बार आंदोलन भी चलाया गया, परंतु परिणाम शून्य ही रहा। इसके लिए लंबा आंदोलन चलाने वाले बुंदेलखंड क्रांति दल के अध्यक्ष सत्येंद्र पाल सिंह ने बताया कि वीरांगना की वीरगति के बाद उनके सभी शस्त्र ग्वालियर के तत्कालीन राजा सिंधिया ने अपने पास रख लिए थे, जो आज तक झांसी नहीं आ पाए। वर्तमान में रानी से जुड़ी हुई कोई भी वस्तु झांसी में नहीं है। ये धरोेहर वापस झांसी लाने के लिए निरंतर आंदोलन चलाया जाता रहा है। एक लाख चिट्ठी राष्ट्रपति को भी भेजी गईं थी। लेकिन, आज तक यह शस्त्र वापस नहीं आ पाए।
समूची दुनिया में नारी शक्ति का मान बढ़ाने वालीं वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का जीवन काल महज 22 वर्ष 6 माह और 29 दिन का रहा। इस अल्पायु में उन्होंने जीवन के विविध रंग देखे और 18 जून 1858 को स्वराज्य की खातिर फिरंगी सेना से युद्ध लड़ती हुईं वीरगति को प्राप्त हो गईं। शुक्रवार को उनकी 163वीं पुण्यतिथि है। इस मौके पर झांसी में घर-घर में दीप जलाकर अपनी ‘बाईसा’ को दीपांजलि अर्पित करेंगे।
रानी के कुशल युद्ध प्रबंधन के सामने बौने साबित हो रहे थे फिरंगी
रानी का जन्म 19 नवंबर 1935 को वाराणसी में हुआ था, बचपन में उन्हें मनु (मणिकर्णिका) के नाम से पुकारा जाता था। 19 मई 1842 को उनकी शादी झांसी के राजा गंगाधर राव से हुई थी, इसके बाद उन्हें लक्ष्मीबाई के नाम से पुकारा जाने लगा था। कालांतर में यही नाम नारी शक्ति की अस्मिता का प्रतीक बनकर उभरा। राजा गंगाधर राव के निधन के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने रानी के दत्तक पुत्र दामोदर राव को झांसी राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया था। जबकि, रानी ने अंग्रेजों का फरमान मानने से साफ इंकार कर दिया था। इससे नाराज कंपनी सरकार ने 1857 में झांसी पर चढ़ाई कर दी थी। लेकिन, रानी के शौर्य और कुशल सैन्य प्रबंधन के आगे अंग्रेजों की भारी भरकम सेना भी बौनी साबित हो रही थी। लंबे युद्ध के बाद भी फिरंगी झांसी राज्य में दाखिल नहीं हो पा रहे थे। लेकिन, अपनों की गद्दारी की वजह से अंग्रेजी सेना को झांसी में प्रवेश का मौका मिल गया था। अंग्रेजों से युद्ध लड़ती हुईं नारी ग्वालियर पहुंच गईं थीं। उनके साथ उनकी छोटी सी सैन्य टुकड़ी थी, परंतु वो अंग्रेजी सेना पर बहुत भारी पड़ रही थी। दांतों से घोड़े की लगाम को थाम रानी दोनों हाथों से तलवार चलाती हुईं दुश्मन सैनिकों के सिर कलम करते हुए आगे बढ़ रहीं थीं। लेकिन, लगातार युद्ध करते रहने की वजह से रानी भी घायल हो चलीं थीं। उनका पुराना घोड़ा साथ छोड़ चुका था, जबकि नया घोड़ा ग्वालियर की स्वर्ण रेखा नदी को पार नहीं कर पाया। अंग्रेजी सेना की बड़ी टुकड़ी ने उन्हें घेर लिया और वे 18 जून 1858 को वीरगति को प्राप्त हो गईं।
घर-घर दीप जलाकर अर्पित करें श्रद्धासुमन
झांसी। वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र दामोदर राव के वंशज इं. योगेश राव नागपुर में साफ्टवेयर इंजीनियर हैं। अमर उजाला से हुई खास बातचीत में उन्होंने कहा कि रानी झांसी की रग-रग में बसती हैं। 18 जून को उनके बलिदान दिवस पर कोविड प्रोटोकॉल के तहत सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जाएं, बल्कि सभी अपने घरों में दीप जलाकर रानी के प्रति अपनी आस्था प्रकट करें।