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सूरत से पैदल आए मजदूर, जख्मी हुए पैर, बह रहा था खून, भूख-प्यास से कई बार हुए बेहोश

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labour returned from outer cities
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पुनीत शर्मा
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झांसी। एक-एक पल भारी हो रहा था। जब सूरत में कहीं कोई व्यवस्था नहीं हुई तो यह सोचकर दो दिन पहले पैदल निकल लिए कि आगे कुछ वाहन मिल जाएंगे। लेकिन यह सफर इनके लिए इतनी बड़ी मुसीबत बन गया कि उस पैदल सफर को सोचकर भी यह कांप उठते हैं। कहने लगे, हमसे हर कोई डर रहा है। खाने के पैकेट भी हाथ में देने की जगह हमारे पास फेंके गए। क्योंकि सड़क-सड़क आ रहे थे लिहाजा कई जगह तो शहरों में उन्हें घुसने तक नहीं दिया। खेतों से होकर शहर पार किए। रात को कस्बे में बने फुटपाथ में सो गए तो लोगों ने मकान की छतों से पानी फेंककर भगा दिया। बिंदा, शिवओम, कलुवा, पंकज, हरिओम, जमुना और कक्कड़ अपनी दास्तां बताते बताते रोने लगे। जख्मी हुए पैर से बहते खून को दिखाते हुए कहने लगते हैं कि साहब, हमें बस घर भिजवा दीजिए।
उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के हजारों मजदूर गुजरात और महाराष्ट्र में मजदूरी करते हैं। हालांकि सरकारों ने दावा किया कि इन सभी को बसों के माध्यम से भेजा जाएगा लेकिन किसी तरह झांसी पहुंचे मजदूरों के सूजे पैरों को देखकर कोई कह नहीं सकता कि इन्हें कहीं कोई सवारी मिली है। कन्नौज के राजेश ने बताया कि वह सूरत में बिस्कुट बेचने का काम करता है। पहले पता चला कि बसें लेकर जाएंगी लेकिन जब बस नहीं आई तो वह पैदल ही निकल पड़े। बसें मिलीं तो थोड़ी दूरी पर ले जाकर छोड़ दिया। वहां से पैदल ही निकल पड़े। करीब 400 किलोमीटर का सफर पैदल किया है। कानपुर के गनेशपुरा गांव निवासी शिवओम धागे की फैक्टरी में काम करता है। वह भी सूरत से एमपी बॉर्डर तक पैदल आया। शिवओम ने बताया कि लोग उनसे ऐसे डर रहे थे कि मानो वह किसी दूसरी दुनिया के हैं। इसे तो छोड़िए एक जगह खाना भी दिया गया तो पैकेट उनके पास फेंक दिए थे। फतेहपुर निवासी अंकित अपने पैर दिखाते हुए रोने लगता है। कहता है कि अब वह कभी अपने गांव से नहीं जाएगा। बड़े शहरों में उन लोगों को घुसने तक नहीं दिया। खेतों से होकर गुजरे। पैरों में कांच लग गया था। मुंकुद सिंह कानपुर के हैं। वह सूरत में मजदूरी करते हैं। कहते हैं रास्ते में एक कस्बा पड़ा था सोचा कि वहां थोड़ा आराम कर लेंगे। सड़क किनारे चादर बिछाई तो लोगों ने चोर-चोर चिल्लाना शुरू कर दिया। मजबूरी में हमें वहां से भागना पड़ा। बहराइच निवासी सूरज ने बताया कि गुजरात से निकलते वक्त एक कस्बा था वहां फुटपाथ पर हम लोगों ने चादर बिछा ली। अभी आंख ही लगी थी कि किसी ने पानी फेंक दिया। पत्थर भी मारा गया था। कुछ जगहों पर पुलिस ने भी लाठियां भांजीं।
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इन जिलों के थे मजदूर
गोरखपुर, कानपुर, कन्नौज, बहराइच, श्रावस्ती, फतेहपुर, गोंडा, आजमगढ़, वाराणसी, इलाहाबाद
एक-दूसरे राज्य में धकेल दे रही पुलिस
झांसी। इस समय सभी राज्य अपनी सीमाएं सुरक्षित करने में जुटे हैं। जहां भी मजदूर दिखते हैं उन्हें पड़ोसी राज्य के बार्डर पर छोड़ दिया जाता है। यही हो रहा है मजदूरों के साथ। मध्यप्रदेश के बार्डर पर छोड़ दिया बाद में सैंकड़ों किलोमीटर पैदल चलो। पिछले तीन दिन से यूपी और एमपी बॉर्डर पर भी यही हो रहा है। मध्यप्रदेश पुलिस ने दो दिन पहले भी यही किया था। गुजरात से आने वाले मजदूरों को अपने यहां रुकने तक नहीं दिया।
साइकिल से निकले थे, खराब हुई तो रास्ते में फेंक दी
झांसी। गुजरात से दो युवक साइकिल लेकर ही निकल पड़े। रास्ते में साइकिल खराब हो गई। अब मैकेनिक की दुकानें भी नहीं खुल रही हैं लिहाजा साइकिल को फेंक दिया गया। कानपुर के इन युवकों ने पैदल ही सफर तय किया। सभी ने बताया कि रास्ते भर उन्हें कहीं खाना नहीं मिला। मध्यप्रदेश बॉर्डर पर जरूर कुछ व्यवस्था उनके लिए की गई थी।
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यूपी बार्डर से सभी को ट्रक और बसों से भेजा गया
झांसी। एसपी सिटी राहुल श्रीवास्तव का कहना है कि बाहर से आने वाले सभी मजदूरों को शेल्टर हाउस में पहुंचा दिया गया है। यहां इन सभी का परीक्षण किया जाएगा। इसके बाद यहां से सभी को बसों के द्वारा इनके जिलों में पहुंचा दिया जाएगा। मजदूर रक्सा थाना क्षेत्र के एमपी-यूपी बार्डर तक आए थे। यहां से वाहनों के द्वारा झांसी तक लाया गया। करीब तीस बसों को लगाया गया था।

labour returned from outer cities- फोटो : REPORTERS

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