एरच। एरच नगरी के धार्मिक इतिहास के क्षेत्र में भी बड़ा नाम है, भक्त प्रहलाद की जन्मस्थ्ली एरच बुंदेलखंड के लोक देवता कुंवर हरदौल की अति प्रिय थी। इतिहासकार डाॅ. चित्रगुप्त बताते हैं कि ओरछा के बुंदेला राजा वीर सिंह जूदेव ने मुगल सरदारों को भगाकर इस क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया था।
वीरसिंह जूदेव ने यहां कुछ निर्माण कार्य कराए थे, वीरसिंह जूदेव को अपने सबसे छोटे पुत्र हरदौल से बेहद लगाव था। कुंवर हरदौल के जन्म लेते ही वीर सिंह ने उन्हें एरच का जागीरदार बना दिया था। किशोर अवस्था में हरदौल ने योद्ध कला, कौशल के साथ-साथ प्रशासनिक व्यवस्था को सीख लिया था, कहा जाता है कि अपने घोड़े पर सवार होकर वह बेतवा के किनारे होकर एरच पहुंच जाते थे।
कुंवर हरदौल की लोकप्रियता एरच ही नहीं बल्कि बुंदेलखंड में फैल गई थी। उन दिनों जुझार सिंह ओरछा के राजा थे, जो राजा वीरसिंह जूदेव के जयेष्ठ पुत्र और हरदौल के जयेष्ठ भ्राता थे।
जुझारसिंह के समय में मुगल सेना की एक टुकडी ओरछा में रहती थी। उस सेना का मुगल सरदार जनता को तंग करता था कुंवर हरदौल को पता चला तो उन्होंने उसे दंडित कर दिया।
ओरछा में मुगल सेना का लगातार प्रतिरोध कुंवर हरदौल करते थे, मुगल यह बात समझ गए थे कि हरदौल के जीवित रहते बुंदेलखंड पर मुगल प्रभावी नहीं हो सकते थे, इसके लिए एक षडयंत्र ओरछा में रचा गया। जिस षडयंत्र के तहत राजमहल में ही कुंवर हरदौल को भोजन में विष दे दिया गय। जिसके सेवन से उनकी मौत हो गई। कहा जाता है कि हरदौल बहन कुंजा की हट पर वह सर शरीर प्रकट हुए थेा उसी समय से ही कुँवर हरदौल लोक देवता के रूप में पूजे जाने लगे थे होली महोत्सव मे भी कुँवर हरदौल की पूजा की जाती हैा बुदेलखंड मे शादी विवाह के पूर्व हरदोल की पूजा के साथ प्रथम निमत्रण दिए जाने का प्रवधान हे एरच नगर उनकी जागीर था। स्थानीय निवासी संत उमेशदत्त शाडिल्य, चंद्रकांत पाठक, रविंद्र केवट ने बताया कि एरच नगर से कुंवर हरदौल का नाता रहा है, यहां पर लोक देवता हरदौल का मंदिर स्थापित किया जाना चाहिए।