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केेंद्र व दिल्ली सरकार की लड़ाई में बनाया मोहरा: तोमर

Thu, 18 Jun 2015 12:59 AM IST
झांसी / ब्यूरो
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फर्जी माइग्रेशन सर्टिफिकेट के मामले की जांच के लिए दिल्ली पुलिस बुधवार को पूर्व कानून मंत्री जितेंद्र सिंह तोमर को लेकर झांसी आई। लंबी जांच-पड़ताल के बाद टीम बुंदेलखंड विश्वविद्यालय (बीयू) से कई दस्तावेजों को अपने साथ ले गई। इससे पूर्व रेलवे स्टेशन के यात्री विश्रामालय में उन्होंने कहा कि दिल्ली व केंद्र सरकार की लड़ाई का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है। इस लड़ाई में उन्हें मोहरा बना दिया गया है। वह जीवन में कभी झांसी नहीं आए। ऐसे में यहां की बुंदेलखंड यूनीवर्सिटी से वह माइग्रेशन सर्टिफिकेट कैसे बनवा सकते हैं, मीडिया उनको बदनाम कर रहा है। कोर्ट में उन्हें अवश्य न्याय मिलेगा।
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बुधवार सुबह करीब साढ़े ग्यारह बजे दिल्ली पुलिस  जितेंद्र सिंह तोमर को लेकर बुंविवि पहुंची।  कुलसचिव कार्यालय में तोमर को ले जाया गया। वहां पुलिस को मांगे गए दस्तावेज उपलब्ध कराए गए। कार्यालय के अंदर पुलिस व बीयू के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा किसी को जाने की अनुमति नहीं दी गई। चूंकि, माइग्रेशन सर्टिफिकेट जारी होने की तिथि 20 अप्रैल 1993 बताई गई है, इसलिए एक-एक कर बीयू के पुराने कर्मचारियों को बुलाया गया। पुलिस ने उनसे पूछताछ कर जानकारी इकट्ठा की। वहीं, अति गोपनीय विभाग के कुछ सीलबंद लिफाफे भी खुलवाए गए।  
जांच पड़ताल में पुलिस को बताया गया कि अंग्रेजी में लिखा हुआ 156 नंबर माइग्रेशन सर्टिफिकेट सन 1998 में मो. असलम के नाम जारी किया गया था। पुलिस उससे जुड़े दस्तावेज अपने साथ ले गई है। वहीं, 20 अप्रैल 1993 को जारी माइग्रेशन सर्टिफिकेट की तिथि पर बीयू ने चार माइग्रेशन सर्टिफिकेट जारी किए हैं। पुलिस उस रिकार्ड की भी फोटोकॉपी ले गई। जांच में तोमर का कोई रिकॉर्ड विश्वविद्यालय में नहीं मिला। बाद में बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से निकलते समय तोमर ने कहा कि जिस माइग्रेशन सर्टिफिकेट के फर्जी होने का जिक्र हो रहा है, वह उनका नहीं है। वह निर्दोष हैं।
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दिल्ली पुलिस साथ नहीं लाई माइग्रेशन
झांसी। तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय से मिले 156 नंबर माइग्रेशन सर्टिफिकेट के फर्जी होने के आरोप में दिल्ली पुलिस तोमर को जांच के लिए बुंदेलखंड विश्वविद्यालय तो लाई  लेकिन प्रमाण पत्र साथ नहीं लाई। कुलसचिव अखिलेश चंद्र ने भी कहा कि यदि पुलिस माइग्रेशन सर्टिफिकेट दिखाती तो उससे कई जानकारियां उभर कर आ सकती थीं। माइग्रेशन के जरिए पता लगाया जा सकता था कि वह किस कोर्स और किसी कॉलेज का है।  गौरतलब है कि बीते शनिवार को आई दिल्ली पुलिस की दो सदस्यीय टीम भी माइग्रेशन सर्टिफिकेट नहीं लाई थी।

बीयू से इन सवालों का जवाब ले गई पुलिस
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- क्या है बीयू में प्रवेश से लेकर माइग्रेशन सर्टिफिकेट जारी होने की प्रक्रिया?
- क्या 156 नंबर माइग्रेशन सर्टिफिकेट किसी अन्य को जारी हुआ है?
- 1993 में बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से कौन से कॉलेज संबद्ध थे?
- क्या एक ही नंबर का माइग्रेशन दो लोगों को जारी किया जा सकता है?
- 20 अप्रैल 1993 तक कौन-कौन अधिकारी थे, उनके नाम क्या हैं?
- अप्रैल 1993 में कितने माइग्रेशन सर्टिफिकेट जारी हुए?

कभी चाय पी, कभी पानी, बाद में खाया खाना
झांसी। कुलसचिव कार्यालय में पूर्व कानून मंत्री ने करीब पांच घंटे दस मिनट बिताए। पूरे समय पुलिस दस्तावेज एकत्र करने व लिखा पढ़ी में लगी रही। इस दौरान तोमर कभी पानी, तो कभी चाय पीते रहे। उन्होंने किसी से कोई बात नहीं कही। बीच-बीच में पुलिस द्वारा पूछताछ करने पर ही उन्होंने मुंह खोला। पुलिस कुछ देर के लिए कुलसचिव कार्यालय में ही बने एक छोटे से कमरे में भी ले गई। जहां उन्होंने आराम किया। इसके बाद एक होटल से तोमर के लिए खाना लाया गया। पुलिस कर्मियों ने भी तोमर के साथ खाना खाया।  पूर्व कानून मंत्री के चेहरे पर न तो कोई शिकन दिखी और न ही कोई तनाव। वह पूरी तरह रिलेक्स नजर आए।


‘20 अप्रैल 1993 को बुंदेलखंड विश्वविद्यालय ने हिंदी माध्यम में 156 नंबर का माइग्रेशन सर्टिफिकेट जारी नहीं किया है। पूर्व कानून मंत्री से जब पूछा कि उन्होंने किस कॉलेज से पढ़ाई की है, तो वह बोले कि पहली बार बुंदेलखंड आना हुआ है। इसके बाद वह चुप हो गए। जांच में पुलिस का पूरा सहयोग किया गया है। जिस संबंध में पुलिस ने जानकारी मांगी उन्हें दे दी गई।’
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- अखिलेश चंद्र, कुलसचिव, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय
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