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बुंदेलखंड में तेजी से बढ़ रहा कटती का चलन

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झांसी। बुंदेलखंड में बंटाईदारी की जगह अब कांट्रैक्ट खेती (कटती) का चलन बढ़ रहा है। खेती के लगातार महंगा होने एवं गांव से हो रहे मजदूरों के पलायन से किसान इसे तेजी से अपना रहे हैँ। कृषि जानकारों का कहना है करीब दस फीसदी की दर से इसमें हर वर्ष इजाफा हो रहा है।
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अमूमन बुंदेलखंड में बंटाईदारी पर खेती का चलन अधिक रहा है। अधिक रकबे में खेत होने अथवा किसी वजह से खेती न कर पाने वाले किसान दूसरे को अपना खेत दे देते हैं लेकिन, उनको खेती में होने वाला खर्च बांटना पड़ता था। इधर बीच खेती में प्राकृतिक वजहों से खतरे बढ़ने के साथ ही लागत में भी इजाफा हुआ है। बंटाईदार किसान अब यह जोखिम उठाने को राजी नहीं। ऐसे में बुंदेलखंड में कटती का चलन बढ़ रहा है। एक साल में खेत की एवज में ही उसे पैसा मिलता है और
उपज में उसकी कोई हिस्सेदारी नहीं रहती। हर वर्ष जेठ-आषाढ़ के महीने में ही एक साल के लिए यह तय हो जाता है। इस बार पिछले वर्ष के मुकाबले अधिक दाम में खेत उठाए गए हैं। पिछले बार दो हजार रुपया बीघा तक उठता था लेकिन, इस बार तीन हजार से साढ़े तीन हजार बीघा तक दाम मिला है। कृषि जानकारों का कहना है कोविड के बाद बाहर से आने वाले प्रवासी भी कटती में दिलचस्पी दिखा रहे हैं वहीं कई जो बाहर चले गए वह भी इसी रीति से अपने खेत दूसरों को दे रहे हैं।
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हालांकि कृषि विभाग के पास इस तरह खेती के कोई आंकड़े नहीं हैं लेकिन, कृषि अफसर भी मानते हैँ कि हर साल इस तरह से खेती कराने वालों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। बता दें, झांसी में ही करीब सवा तीन लाख किसान हैं। यहां कृषि उत्पादन में कुल 354.099 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में खेती होती है। यहां औसत उत्पादकता महज 6.45 कुंतल प्रति हेक्टेयर ही है जबकि लागत 20 हजार रुपये के करीब बैठती है।
खेती पर खर्च बढ़ रहा है। डीजल का दाम हर दिन बढ़ रहा है। समय पर बारिश न होने से नुकसान भी हो जाता है। इसलिए पूरा 12 बीघा खेत साल भर के लिए दे दिया। पिछली बार के मुकाबले इस बार पैसा अधिक मिला है। रामाधर निषाद , बड़ागांव, मऊरानीपुर
पिछले कई बार से खेती में लगातार नुकसान हो रहा था। इस बार भी बारिश समय पर नहीं हुई। इस वजह से हिम्मत नहीं पड़ी। पूरे साल भर के लिए खेत दे दिया। मुकेश रैकवार, मऊरानीपुर
बहुत सारे किसान अब इसी तरह खेत अपने दे रहे हैं। खेती करने वाले एकसाथ खेती कराते हैं, तब उनको भी फायदा होता है। छोटी जोत वालों के लिए खेती मुश्किल होती जा रही है। डीजल का दाम बढ़ने से भी इस बार खेेती करना मंहगा हो गया। नंदराम सिंह खंगार, देवरी सिंधपुरा, बंगरा
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