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झांसी का रेशम बढ़ा रहा बनारसी साड़ियों की रौनक: विदेशों से भी आ रही डिमांड, बढ़ाया गया उत्पादन का लक्ष्य

Sun, 23 Nov 2025 10:14 AM IST
दीपक महाजन संवाद न्यूज एजेंसी, झांसी

सार

यहां का रेशम बनारसी साड़ियों और मालदा के मलमल की राैनक बढ़ा रहा है। झांसी परिक्षेत्र के आधा दर्जन से ज्यादा जिलों में पैदा हो रहे टसर रेशम से बने परिधानों की चमक देश ही नहीं, बल्कि विदेश में भी है।
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रेशम उत्पादन, सांकेतिक - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यहां का रेशम बनारसी साड़ियों और मालदा के मलमल की राैनक बढ़ा रहा है। झांसी परिक्षेत्र के आधा दर्जन से ज्यादा जिलों में पैदा हो रहे टसर रेशम से बने परिधानों की चमक देश ही नहीं, बल्कि विदेश में भी है। लगातार मांग बढ़ने पर इस वित्तीय वर्ष में रेशम उत्पादन का लक्ष्य 4 लाख बढ़ाकर 22 लाख कर दिया गया है। यहां ककून से रेशम निकालने के बाद उसे वाराणसी और पश्चिम बंगाल के मादा भेजा जाता है।
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44 लाख रुपये का रेशम हुआ उत्पादित
रेशम विभाग के मुताबिक झांसी परिक्षेत्र के झांसी, ललितपुर, जालौन, बांदा और चित्रकूट जिले में करीब 120 किसान इससे जुड़े हैं। इन्होंने अपनी जमीन पर अर्जुन के पौधे रोपे। फिर उन पर रेशम के कीड़े पाले। फिलहाल 244 एकड़ जमीन में कीड़े पाले जा रहे हैं। जिले में टसर रेशम के चार फॉर्म संचालित हैं। झांसी के बबीना ब्लाॅक के घिसाैली, बदनपुर, बंगरा ब्लाॅक के कटेरा देहात और मऊरानीपुर ब्लाॅक के बुखारा में इस वर्ष करीब 44 लाख रुपये का रेशम उत्पादित हुआ है।

विदेशों में बिखेर रहा चमक
यहां के रेशम से बने कुर्ते, धोती, टाटपट्टी, साड़ियां और अन्य परिधान अरब देशों, श्रीलंका, नेपाल, इंडोनेशिया में भी चमक बिखेर रहे हैं। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ी है बल्कि विश्व पटल पर झांसी का नाम रोशन हो रहा है। रंग, मजबूती और कोमलता के कारण झांसी का रेशम पारंपरिक बनारसी बुनाई को जीवंतता दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों शहरों के बीच बढ़ता यह व्यापारिक सहयोग साड़ी उद्योग को नई दिशा दे सकता है।
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किसानों का यह है कहना
बदनपुर के किसान नेत्रपाल सिंह का कहना है कि रेशम के कीड़े पालने से उसकी आमदनी बढ़ी है। वह हर साल करीब एक लाख 20 हजार रुपये के रेशम का उत्पादन कर लेता है। इसमें उसका परिवार भी मदद करता है। वहीं किसान बिंदा का कहना है वह प्रतिवर्ष करीब एक लाख रुपये का रेशम उत्पादन कर लेता है। 

ऐसे बनता है रेशम
जानकारों के मुताबिक रेशम का कीड़ा अर्जुन के पत्तों को खाता है। इससे उसकी वृद्धि होती है फिर यह अंडे के आकार का ककून का निर्माण करता है। ककून से रेशम निकलता है, जिसे वाराणसी और पश्चिम बंगाल के मालदा भेजा जाता है। जहां फैक्टरी में साड़ियां, कुर्ता, पायजामा, तकिया का कवर समेत अन्य कपड़े तैयार कर उनका निर्यात विदेश में भी किया जा रहा है।

इस तरह बढ़ा लक्ष्य
विभाग ने रेशम उत्पादन का लक्ष्य लगातार बढ़ाया है। तीन साल पहले जहां 10 लाख ककून तैयार करने का लक्ष्य था, उसे बढ़ाकर 2023-24 में 14 लाख किया गया। 2024-25 में यह 18 लाख हो गया, जबकि 2025-26 में इसे बढ़ाकर 22 लाख ककून कर दिया गया। किसान इस लक्ष्य को पूरा करने में जुटे हुए हैं।


झांसी परिक्षेत्र में उत्पादित टसर रेशम की विदेश में काफी मांग है। इसीलिए उसका लक्ष्य भी बढ़ाया जा रहा है।- जीपी अनुरागी, सहायक निदेशक, रेशम, झांसी
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वाराणसी में कर्नाटक का सिल्क ज्यादा उपयोग किया जाता है। बहुत से व्यापारी झांसी का भी सिल्क मंगाते हैं। पश्चिम बंगाल में भी झांसी के सिल्क की बहुत मांग है। टसर रेशम की गुणवत्ता अच्छी होती है। इसलिए झांसी के रेशम की मांग बढ़ रही हैं। झांसी, ललितपुर में इसका अच्छा उत्पादन होता है। - एके राव, सहायक निदेशक, रेशम, वाराणसी
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