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Jhansi: डिजिटल भारत की तस्वीर में मेरा चेहरा भी बदले, प्रेमनगर के डाकघर का छलका दर्द, पाती में बयां की पीड़ा

Wed, 08 Jul 2026 04:02 PM IST
दीपक महाजन अमर उजाला नेटवर्क, झांसी

सार

वर्षों से बदहाल पड़े प्रेमनगर के उपडाकघर ने पाती के माध्यम से अपना दर्द बयां किया है। उसने गुहार लगाई है कि तेजी हो रहे विकास व डिजिटल युग में उसे क्यों अनदेखा किया जा रहा है।
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प्रेमनगर का उप डाकघर। - फोटो : संवाद व एआई।
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विस्तार
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प्रिय जिम्मेदारों, मैं प्रेमनगर का डाकघर हूं। वर्षों से इस इलाके के लोगों की खुशियां, उम्मीदें, सरकारी योजनाएं, पेंशन, बचत और जरूरी दस्तावेज अपने कंधों पर ढोता आया हूं। समय बदल गया, चिट्ठियों की जगह डिजिटल सेवाओं ने ले ली, लेकिन मेरी हालत आज भी नहीं बदली।
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आज बरसात का मौसम है और मैं पक्की छत के बजाय टिनशेड के सहारे खड़ा हूं। तेज बारिश होती है तो टिन पर पड़ती बूंदों का शोर लोगों की आवाज दबा देता है। कहीं पानी टपकने का डर, कहीं रिकॉर्ड और उपकरणों के भीगने की चिंता, तो कहीं कर्मचारियों और ग्राहकों को होने वाली असुविधा। हर बारिश मेरे लिए एक नई परीक्षा लेकर आती है।

विडंबना देखिए, देश डिजिटल इंडिया की ओर तेजी से बढ़ रहा है। लोग यहां आधार आधारित बैंकिंग, बचत खाते, डाक बीमा, स्पीड पोस्ट और अनेक ऑनलाइन सेवाओं के लिए आते हैं, लेकिन इन सेवाओं का केंद्र बना मैं खुद बदहाली का शिकार हूं। आधुनिक सुविधाएं देने की जिम्मेदारी निभा रहा हूं, जबकि मेरा अपना ढांचा जर्जर हो चुका है।
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मेरे भरोसे प्रेमनगर और आसपास के करीब तीन लाख लोगों की जरूरतें जुड़ी हैं। हर दिन बुजुर्ग अपनी पेंशन लेने आते हैं, छात्र आवेदन भेजते हैं, परिवार अपने जरूरी पार्सल और दस्तावेज मुझ तक लेकर पहुंचते हैं। मैं किसी को निराश नहीं करना चाहता लेकिन मेरी जर्जर हालत उन्हें भी परेशान करती है।

सबसे ज्यादा पीड़ा तब होती है, जब मेरे अपने प्रभारी भी कहते हैं कि इस भवन को सुधार की जरूरत है। जब यहां काम करने वाले कर्मचारी ही बेहतर व्यवस्था की मांग कर रहे हैं, तो समझा जा सकता है कि मेरी स्थिति कितनी गंभीर है।

मुझे किसी आलीशान इमारत की चाह नहीं है। बस इतनी इच्छा है कि मेरे पास सुरक्षित और मजबूत भवन हो, जहां बारिश का डर न हो, कर्मचारी सम्मानजनक माहौल में काम कर सकें और आम नागरिकों को भी बेहतर सुविधाएं मिल सकें।

मैं भी चाहता हूं कि डिजिटल भारत की तस्वीर में मेरा चेहरा बदहाल नहीं, बल्कि आधुनिक और सुरक्षित दिखे। आखिर मैं सिर्फ एक डाकघर नहीं, बल्कि लाखों लोगों के भरोसे का पता हूं।
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आपका अपना
प्रेमनगर डाकघर, झांसी
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