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ऑडिटर से पदोन्नत कर बनाया लेखाधिकारी, मंडलायुक्त ने नकारा

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झांसी। जल संस्थान में पांच सदस्यीय कार्मिक समिति द्वारा ऑडिटर के पद पर कार्यरत एक कर्मचारी को लेखाधिकारी बनाए जाने मेें नियमों की अनदेखी की गई थी। मंडलायुक्त ने जांच के बाद पदोन्नति को खारिज कर कर्मचारी को दोबारा ऑडिटर बना दिया है। इससे समिति कठघरे में खड़ी हो गई है।
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शासन को भेजे एक शिकायत पत्र में बताया गया था कि 18 अप्रैल 2015 को लिपिक मोहम्मद शफीक की पदोन्नति ऑडिटर पद पर की गई। आरोप लगाया कि वह वरिष्ठता सूची में पांचवें स्थान पर हैं। इसके बाद भी पदोन्नत कर दिया गया। यहीं नहीं, ऑडिटर के दो पद खाली थे, लेकिन एक ही पदोन्नति की गई। कैडर परिवर्तन करने का भी आरोप लगाया गया। इसके बाद तत्कालीन महाप्रबंधक द्वारा गठित पांच सदस्यीय कार्मिक समिति ने 16 अक्तूबर 2019 को छह कर्मचारियों की पदोन्नति की। इसमें उक्त कर्मचारी को ऑडिटर से सीधा लेखाधिकारी बना दिया गया। ऑडिटर का 2400 रुपये वेतनमान और लेखाधिकारी का 5400 रुपये वेतनमान होता है। इस पदोन्नति से विवाद खड़ा हो गया।
श्रम एवं सेवायोजन राज्यमंत्री मनोहर लाल पंथ (मन्नू कोरी) ने इस मामले की शिकायत नगर विकास मंत्री से की। मंडलायुक्त ने शिकायतों के आधार पर 18 अगस्त 2020 को दो सदस्यीय जांच समिति का गठन कर दिया। समिति में अपर आयुक्त (वित्त) व संयुक्त विकास आयुक्त को रखा गया। अधिकारियों ने जांच कर रिपोर्ट मंडलायुक्त को सौंप दी।
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मंडलायुक्त ने जांच रिपोर्ट के आधार पर पाया कि कमेटी ने त्रुटिपूर्ण व्याख्या कर नियम विरुद्ध पदोन्नति दी है। उनके निर्देश पर जलसंस्थान महाप्रबंधक ने उक्त कर्मचारी को पूर्व पद ऑडिटर पर वापस कर दिया है। इस मामले में मोहम्मद शफीक ने बताया कि उच्च न्यायालय के निर्देश पर कमेटी ने उनको लेखाधिकारी बनाया था। इस निर्णय के खिलाफ वह उच्च न्यायालय में दोबारा याचिका दायर करेंगे।
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