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विदेशी धरती पर फहराया था गुलाम भारत का परचम

Fri, 28 Aug 2015 11:33 PM IST
झांसी/ ब्यूरो
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अपने खेल के जरिये गुलाम भारत का विदेशी धरती पर परचम फहराने वाले हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का जन्मदिवस शनिवार को पूरे देश में खेल दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इस अवसर पर विभिन्न खेल आयोजन होंगे और खिलाड़ियों को पुरस्कृत किया जाएगा। लेकिन, खेल प्रेमियों के दिल में दद्दा को भारत रत्न न मिलने का अफसोस बना रहेगा।
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वैसे तो दद्दा ध्यानचंद कभी किसी सम्मान के मोहताज नहीं रहे। सभी सम्मान उनके सामने बौने ही रहे। लेकिन, भारत सरकार ने जन आकांक्षाओं को दृष्टिगत रखते हुए उन्हें 1956 में पद्म भूषण से अलंकृत किया था। इसके अलावा भी उन्हें देश - विदेश में तमाम सम्मान हासिल हुए। तत्कालीन सांसद डा. पं. विश्वनाथ शर्मा के प्रयासों से उनके जन्मदिवस 29 अगस्त को सरकार ने राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया था। पिछले लंबे समय से मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न देने की मांग की जा रही है। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर कवायद भी की गई थी। पूर्व केंद्रीय ग्रामीण ग्रामीण विकास राज्य मंत्री /स्थानीय सांसद प्रदीप जैन की अगुवाई में 165 सांसदों ने पत्र लिखकर प्रधानमंत्री को सौंपा था। खेल विभाग ने इस पर सहमति जता दी थी, लेकिन मामला प्रधानमंत्री कार्यालय में जाकर अटक गया। प्रदीप जैन के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी दद्दा को भारत रत्न देने पर सहमति जता चुके है। बावजूद, यह सम्मान उन्हें मिल नहीं पाया है। इससे खेल प्रेमियों में निराशा का भाव है।

ऊबड़-खाबड़ मैदान से ओलंपिक तक पहुंचे दद्दा
झांसी। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की जन्मभूमि इलाहाबाद थी, लेकिन उनके भीतर हॉकी का जन्म झांसी में हुआ था। यहां के ऊबड़-खाबड़ मैदान से शुरू हुए उनके हॉकी के सफर ने बाद में ओलंपिक में आसमान की ऊंचाइयों को छुआ।
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मेजर ध्यानचंद का  जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद में हुआ था, लेकिन बाल्यावस्था में ही वह अपने परिवार के साथ झांसी आकर बस गए थे। यहां सीपरी बाजार के मैदान (हीरोज फील्ड) में वह हॉकी की प्रैक्टिस किया करते थे। हॉकी स्टिक की जगह उनके हाथ में पेड़ की टहनी होती थी, जिसके जरिये वह कपड़े की बॉल को अपने इशारों पर नचाया करते थे। 14 वर्ष की आयु में उनके जीवन ने टर्निंग प्वाइंट लिया। इस साल वह अपने पिता के साथ हॉकी मैच देखने गए थे। इस मैच में एक टीम दो गोल से पिछड़ रही थी तथा हार के कगार पर पहुंच चुकी थी। मेजर ध्यानचंद ने पिता से पिछड़ी टीम में खेलने की इच्छा जताई। पिता ने ध्यानचंद के आग्रह को आर्मी ऑफिसर के पास पहुंचाया, वह ध्यानचंद को खिलाने को राजी हो गए। ध्यानचंद मैदान में उतरे और उन्होंने चार गोल दागे, जिससे हारने की कगार पर पहुंच चुकी टीम मैच की विजेता बन गई। 1922 में उन्होंने आर्मी ज्वाइन कर ली। यहां भी उनका खेल जारी रहा। 1926 में उन्हें इंडियन हॉकी टीम में शामिल कर लिया गया। अपने खेल जीवन में उन्हें तीन ओलंपिक एम्सटर्डम (1928), लॉस एंजिल्स (1932) तथा बर्लिन (1936) खेलने का मौका मिला, जिसमें उन्हें तीन गोल्ड मैडल हासिल हुए।

हिटलर व डॉन ब्रेडमैन भी थे करिश्माई हॉकी के कायल
झांसी। मेजर ध्यानचंद के करिश्माई खेल के करोड़ों प्रशंसकों में जर्मन तानाशाह हिटलर व महान क्रिकेटर डॉन ब्रेडमैन भी कायल थे।
1935 में भारतीय टीम के आस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड के दौरे के दौरान एडिलेड में आयोजित एक मैच देखने महान क्रिकेटर डॉन ब्रेडमैन भी पहुंचे थे। यहां उनकी मुलाकात मेजर ध्यानचंद से हुई थी। ब्रेडमैन ने तब मेजर का खेल देखने के बाद कहा था कि वह इस तरह से गोल करते हैं, जैसे क्रिकेट में रन बनते हैं। इस दौरे में ध्यानचंद ने 48 मैचों में 201 गोल दागे थे। ध्यानचंद ने इसके एक साल बाद बर्लिन ओलंपिक में जर्मन तानाशाह हिटलर को भी अपनी हॉकी का कायल बना दिया था। हिटलर ने उन्हें जर्मन आर्मी में उच्च पद की पेशकश की थी, परंतु देश प्रेम की भावना के चलते उन्होंने हिटलर की उस पेशकश को ठुकरा दिया था।

हीरोज फील्ड में नजर नहीं आते अब हीरो
झांसी। मेजर ध्यानचंद सीपरी बाजार के जिस मैदान में हॉकी प्रैक्टिस किया करते थे, उसे हीरोज फील्ड के नाम से जाना जाता है। अपने वृद्धावस्था के दिनों में दद्दा यहां बैठकर नवयुवकों को हॉकी खेलते देखा करते थे तथा उन्हें खेल की बारीकियां समझाते थे। दद्दा के निधन के कई सालों बाद तक यह मैदान  हॉकी खिलाड़ियों से गुलजार बना रहता था, लेकिन इस मैदान का वह स्वर्णिम दौर गुजर चुका है। अब यहां हॉकी की जगह क्रिकेट नजर आता है। मैदान में भी हॉकी के बढ़ावे के लिए कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं। इसके अलावा मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में भी हॉकी खेल के बढ़ावे को बेहतर सुविधाओं का अभाव है।
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