झांसी। आज पुलिस बेहद प्रेशर में रहती है। माफियाओं पर जरा सी कार्रवाई होते ही सिफारिशों का सिलसिला शुरू हो जाता है। सियासी चोला धारण करने वाले माफियाओं के लिए हर पार्टी के नेता खड़े हो जाते हैं। बड़ी दूर-दूर से फोन आने लगते हैं। अगर बात नहीं सुनो तो बड़ा तनाव झेलना पड़ता है। रिटायर पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कानपुर के विकास दुबे जैसे माफिया सियासी संरक्षण में ही ताकतवर होते रहे। अगर पहले से कार्रवाई की गई होती तो आज आठ पुलिस के जवान शहीद न होते।
पुलिस सेवा से वर्ष 2007 में एसपी के पद से रिटायर होने वाले जयराम दास का कहना है कि पुलिस भारी प्रेशर में रहती है। अगर उनकी बात न सुनो तो तत्काल ट्रांसफर करा देते हैं। हालांकि उनके समय में प्रेशर कम था लेकिन आज तो जिस तरह से विभाग के लोग बताते हैं उस हिसाब से नौकरी करना मुश्किल है। पुलिस खुलकर काम कर ही नहीं पाती। किसी असरदार शख्स को पकड़ लाओ तो तमाम लोग छुड़ाने के लिए पहुंच जाते हैं। उनका कहना है कि विकास दुबे पर कार्रवाई न होने से साफ है कि वह सियासी संरक्षण में था।
झांसी निवासी सेवानिवृत सीओ कल्याण सिंह कहते हैं कि सियासी संरक्षण में ही विकास दुबे जैसे माफियाओं के हौसले बुलंद रहते हैं। वरना एक माफिया कि इतनी हिम्मत कभी नहीं होती कि वह पुलिस पर गोलियां चलवा दे। लगातार वारदात करता रहा मगर पुलिस ने उसे गिरफ्तार नहीं किया।
रिटायर डिप्टी एसपी एके हिंगवासिया का कहना है कि इस घटना की गंभीरता से जांच होनी चाहिए। जिस तरह से बताया जा रहा है कि आपरेशन कि सूचना लीक हुई है उसके हिसाब से भी जांच होनी चाहिए। माफिया के किस किस से रिश्ते थे उसकी भी पड़ताल जरूरी है। विभाग में लंबे समय तक काम करने वाले अधिकारियों का कहना है कि माफियाओं के रिश्ते सभी पार्टियों में होते हैं। जो भी पार्टी सत्ता में होती है उसी में जगह बना लेते हैं।