झांसी। एक ओर जहां बेटियां समाज के बंधनों से बाहर निकल कर नित नए आयाम स्थापित कर रही हैं, तो वहीं दूसरी ओर समाज के एक बड़े तबके में बेटियों को अब भी भेदभाव और बोझ की नजर से देखा जाता है। इसी का नतीजा है कि अनाथालयों में लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या कहीं अधिक है।
नारी के आगे अब ‘अबला’ शब्द का इस्तेमाल करना कमोबेश बंद कर दिया गया है। समाज द्वारा दिए गए इस ‘नाम’ को उन्होंने अपने बलबूते पर खुद खत्म किया है। आज समाज के हर वर्ग में महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। यहां तक कि सेना में भी वह पूरी मजबूती से मोर्चा संभाल रही।
बावजूद, उनके प्रति समाज के एक बड़े तबके के नजरिये में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। पहले उनका कोख में कत्ल किया जाता है और यदि किस्मत से वह दुनिया में आ भी जाती हैं, तो उन्हें लावारिस छोड़ दिया जाता है। इसका अंदाजा नगर में मिशनरीज द्वारा संचालित होने वाले अनाथालयों में बच्चों की संख्या को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है।
खाती बाबा स्थित सेंट जूड आश्रम में वर्तमान में 14 बच्चे हैं। इनमें लड़के केवल दो हैं, जबकि लड़कियों की संख्या 12 है। कुछ यही तस्वीर सिविल लाइंस स्थित मदर टेरेसा आश्रम की भी है। यहां 21 बच्चे हैं, जिनमें 15 लड़कियां व छह लड़के हैं।
अनाथालयों में पहुंचने वाले बच्चों में सत्तर से अस्सी फीसदी संख्या लड़कियों की होती है। बालिकाओं के प्रति भेदभाव खत्म करने को ‘पढ़ें बेटियां-बढ़ें बेटियां’ अभियान चलाया जा रहा है, जिसके दूरगामी सुखद परिणाम सामने आएंगे।
- राजीव शर्मा, जिला प्रोबेशन अधिकारी
जिले की स्याह है तस्वीर
झांसी। बालिकाएं जन्म के बाद ही नहीं, बल्कि जन्म से पहले भी भेदभाव का शिकार हैं। तमाम कोशिशों के बाद भी कन्या भ्रूण हत्या पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जहां साल 2001 में जिले में एक हजार पुरुषों पर 886 महिलाएं थीं, तो वहीं अब यह संख्या घटकर 866 रह गई है।
सबसे खराब स्थित नगर से सटे बड़ागांव ब्लाक की है। यहां लिंगानुपात 774 है। इसके अलावा मोंठ में 844, चिरगांव में 857, मऊरानीपुर में 860, गुरसरांय में 861, बामौर में 865, बबीना में 880 व बंगरा में प्रति एक हजार पुरुषों पर 882 महिलाएं हैं।