रानी की तलवार और राजदंड झांसी आने की बंधी आस
झांसी। वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई की तलवार और झांसी राज्य के राजदंड को वापस झांसी लाने की दिशा में बड़ी पहल हुई है। इसके लिए प्रदेश के पूर्व राज्यपाल राम नाईक ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है। उन्होंने रानी से जुड़ी इन वस्तुओं को झांसी के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना है। इससे तलवार और राजदंड के झांसी आने की आस जग गईं है।
‘चमक उठी सन सत्तावन में, वो तलवार पुरानी थी...’ सुभद्रा कुमारी चौहान की इन पंक्तियों में रानी की वीरगाथा का वर्णन किया गया है, इसमें उनकी तलवार के शौर्य का भी बखान है। यही वो तलवार थी, जिसके जरिये वीरांगना ने फिरंगी सेना के दांत खट्टे कर दिए थे। 18 जून 1858 को रानी ने ग्वालियर में वीरगति प्राप्त की थी। तब उनके पास तलवार, ढाल और कवच था। रानी की शहादत के बाद ये सारा सामान ग्वालियर में ही संरक्षित कर लिया गया था, जो आज भी ग्वालियर नगर निगम के संग्रहालय में रखा हुआ है और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना रहता है। वहीं, झांसी राज्य का राजदंड 1857 के गदर के दौरान अंग्रेजी सेना ने अपने कब्जे में ले लिया था, जो वर्तमान में कुमाऊं रेजीमेंट के रानीखेत स्थित संग्रहालय में सुरक्षित है।
रानी की तलवार और झांसी राज्य के राजदंड को वापस लेने की मांग लंबे समय से की जा रही है। झांसी आने वाले पर्यटक भी संग्रहालय में रानी से जुड़ी कोई वस्तु न पाने पर मायूस हो जाते हैं। लेकिन, अब इस दिशा में गंभीर प्रयास शुरू हुए हैं। 20 जून को प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक झांसी आए थे। यहां वे गणेश मंदिर में आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए थे। इस दौरान महाराष्ट्र गणेश मंदिर कमेटी के सचिव गजानन खानवलकर ने राज्यपाल से रानी की तलवार और राजदंड को वापस झांसी लाने की मांग की थी। राम नाईक ने इसे गंभीरता से लिया है। उन्होंने राज्यपाल रहते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री को व्यक्तिगत पत्र भेजा है, जिसके जरिये तलवार और राजदंड को झांसी वापस लाने की दिशा में कार्यवाही करने को कहा है। उन्होंने इन वस्तुओं को उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक अवशेष बताए हैं। साथ ही झांसी के लिए इसे महत्वपूर्ण माना है।
रानी की तलवार ग्वालियर नगर निगम के संग्रहालय में है, जबकि राजदंड कुमाऊं रेजीमेंट के पास है। ये संपत्ति झांसी की है, जो यहां होनी चाहिए। लेकिन, दुर्भाग्य से रानी के झांसी में उनसे जुड़े ये अवशेष नहीं है। इस दिशा में केंद्रीय स्तर पर गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए। पूर्व राज्यपाल द्वारा की गई पहल से उम्मीद बंधी है।
- मुकुंद मेहरोत्रा, इतिहासकार
तलवार और राजदंड को वापस लाने के लिए कई बार आंदोलन किया गया, लेकिन राजनीतिक स्तर पर इस दिशा में कोई पहल नहीं की गई। जबकि, झांसी के लिए ये बेहद जरूरी है। बाहर से आने वाले पर्यटक रानी के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहते हैं, लेकिन अफसोस की बात है कि उन्हें यहां रानी से जुड़ी कोई वस्तु नहीं मिलती।
- सत्येंद्र पाल सिंह, अध्यक्ष - बुंदेलखंड क्रांति दल
कागजों में दफन हुआ रानी परिपथ
केंद्र सरकार ने 2015 में रानी की गौरवगाथा पर आधारित पर्यटन परिपथ बनाने की योजना बनाई थी। इसमें उन सभी स्थानों को शामिल किया गया था, जिनका रानी से संबंध रहा रहा था। परिपथ में झांसी, ग्वालियर, कालपी को जोड़ा जाना था। इसमें पुरा अवशेषों का जीर्णोद्धार किया जाना था। उन तक पहुंचने वाले मार्गों का भी विकास होना था। पर्यटक सुविधाएं विकसित की जानीं थीं, लेकिन ये कागजों में ही दौड़ता रहा। अब तक धरातल पर नहीं उतर पाया है।
दरक रही हैं रानी महल की दीवारें
सालों तक वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का आवास रहा रानी महल भी खस्ताहाल स्थिति में हैं। इसकी दीवारें दरकने लगी हैं। छतों पर बनी चित्रकारी संरक्षण के अभाव में अपना रंग छोड़ रही हैं। दरवाजे और खिड़कियां भी साथ छोड़ने की कगार पर हैं। ये हाल तब है, जबकि ये ऐतिहासिक इमारत पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। महल में छठवीं, सातवीं शताब्दी की मूर्तियां रखी हुई हैं, लेकिन रानी से जुड़ी कोई वस्तु यहां नहीं है, जिससे महल में आने वाले पर्यटकों को मायूसी होती है।