अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। बरसाने की तर्ज झांसी के डगरवाहा गांव में भी लठामार होली खेली जाती है। इस गांव में यह परंपरा पिछले ग्यारह सौ सालों से अनवरत रूप से चली आ रही है। इस बार भी गांव में लट्ठमार होली की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। इसे लेकर सभी उत्साहित हैं। गांव में जगह-जगह महिलाएं गुलाल उड़ातीं और ढोल की थाप पर फाग गायन कर रहीं हैं।
झांसी-शिवपुरी हाईवे से तकरीबन तीन किमी भीतर स्थित डगरवाहा गांव में इन दिनों होली की रौनक बिखरी हुई है। दोपहर में गांव में प्रवेश करते ही महिलाओं के फाग गायन की आवाज सुनाई देने लगती हैं और गांव की गलियों में दौड़ते बच्चे गुलाल से सराबोर नजर आते हैं। जबकि, शाम को गांव के खातीबाबा मंदिर के बाहर बरामदे में पुरुषों की महफिल जमती है और देर रात तक फाग गूंजती रहती है। पिछले एक सप्ताह से गांव में यही स्थिति बनी हुई है। इसके अलावा घर-घर में लट्ठ भी तैयार किए जा रहे हैं। मजबूती के लिए लट्ठों को तेल पिलाया जा रहा है। 24 मार्च को होली की दूज पर इन लट्ठों का महिलाएं लठामार होली में प्रयोग करेंगी।
गांव की ग्यारह सौ साल पुरानी परंपरा के अनुसार यहां होली की दूज पर लठामार होली खेली जाती है। गांव के खातीबाबा मंदिर के बाहर मैदान में 50 फीट ऊंचे एक खंभे पर एक कपड़े की पोटली में गुड़ और नकदी बांधकर खंभे पर टांग दी जाती है, जिसे उतारने के लिए हुरियारों की टोलियां पहुंचती हैं। गांव की महिलाएं लट्ठ मारकर उन्हें रोकती हैं। लाठियों से बचते-बचाते जो उस पोटली को खंभे से उतारने में कामयाब हो जाता है, पुरस्कार की राशि उसी की हो जाती है। यहां होने वाली लठामार होली को देखने के लिए आसपास के लगभग एक सैकड़ा गांवों के ग्रामीण यहां पहुंचते हैं।
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फिर पंचमी पर भी बरसते हैं लट्ठ
खंभे पर टंगी पोटली को उतारने से रोकने के लिए गांव की महिलाएं होली की दूज पर पुरुषों पर जमकर लट्ठ बरसाती हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि महिलाओं के लट्ठों की बौछार के बीच कोई भी पोटली तक पहुंचने का साहस नहीं जुटा पाता है। ऐसे में पंचमी को फिर लठामार होली का आयोजन किया जाता है। हालांकि, 20-25 सालों के अंतराल में ही ऐसा मौका आता है।
बाहरी गांव की महिलाएं नहीं ले सकतीं हिस्सा
परंपरा के अनुसार लठामार होली में सिर्फ डगरवाहा गांव की महिलाएं ही शामिल हो सकती हैं। बाहरी गांव की महिलाओं को इसमें शामिल नहीं किया जाता है। जबकि, कोई भी पुरुष इस होली में शामिल हो सकता है। पुरुष भी अपने बचाव में लाठियां लेकर आते हैं। वह अपने साथ लाईं गईं लाठियों को दोनों हाथों से पकड़कर महिलाओं के लट्ठों से बचाव करते हैं।
मथुरा से आए परिवार ने शुरू की थी परंपरा
डगरवाहा ग्राम की प्रधान अंजली यादव के पति रहीस चंद्र यादव ने बताया कि ग्यारह सौ साल पहले मथुरा से आया एक परिवार यहां गांव में आकर बस गया था। उसी परिवार की ओर से गांव में लट्ठमार होली की शुरुआत की गई थी। हालांकि, कालांतर में लोग उस परिवार को तो भूल गए, परंतु उनके द्वारा शुरू की गई परंपरा आज भी कायम है।
यह बोली महिलाएं...
हमारे गांव और घर की बुजुर्ग महिलाओं से मिली विरासत को अब हम संभाल रहे हैं। लठामार होली में गांव में रहने वाले सभी परिवारों की महिलाएं हिस्सा लेती हैं। सभी को बहुत अच्छा लगता है। - खुशबू
लठामार होली की तैयारियां महीने भर पहले से शुरु हो जाती हैं। लट्ठ तैयार किए जाने लगते हैं। यह काम गांव के पुरुष करते हैं। हर महिला के पास 10-12 लट्ठ होते हैं। एक के टूटने पर दूसरे का उपयोग करने लगते हैं। - खुशबू कुमारी
लठामार होली के दौरान सभी अपनी मर्यादाओं का पूरा ख्याल रखते हैं। कई बार लाठी लगने से हुरियारों को चोट भी लग जाती है, लेकिन इसे लेकर कभी कोई विवाद नहीं करता है। यहां तक कि शिकायत तक कोई नहीं करता। - भारती
गांव में आने वाली बहू शादी के तीन-चार साल बाद लठामार होली का हिस्सा बन जाती है। इसके लिए उसकी सास व अन्य महिलाएं प्रेरित करती हैं। पुरानी परंपरा के निर्वहन के लिए हर महिला खुशी-खुशी तैयार हो जाती है। - शशि