मेजर ध्यानचंद को मिले पुरस्कार।
- फोटो : अमर उजाला
अशोक ध्यानचंद बताते हैं कि दद्दा को अरहर की दाल तो इतनी पसंद थी कि वह इसे हर रोज खाते थे। वहीं, मीट के अलावा आलू-प्याज की सब्जी और पराठे दद्दा की पहली पसंद थे। एक बड़ा गिलास दूध पीना उनकी रोज की आदत थी। सफेद टीशर्ट, पैंट और चमचमाते जूते ही पहनते थे।
ऐसे पड़ा हॉकी के जादूगर नाम
अशोक ध्यानचंद बताते हैं कि पिता जी वर्ष 1928 में एम्स्टर्डम ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम से खेले थे। उस वक्त उन्हें 102 बुखार था। उन्हें खेलने से मना किया गया तो उन्होंने कहा कि वह फौजी हैं, अपने देश के लिए जरूर खेलेंगे। मैच में उन्होंने नीदरलैंड के खिलाफ फाइनल में भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। यहीं से लोग उन्हें हॉकी का जादूगर कहने लगे।
75 वर्ष के सुल्तान अहमद खान बताते हैं कि यह करीब 45 साल पुरानी बात है, जिला पीस कमेटी की बैठक में वह दद्दा को अपनी मोटरसाइकिल पर पीछे बैठाकर जब भी कोतवाली जाते थे तो रास्ते की भीड़भाड़ देख दद्दा हमेशा यही जुमला बोलते थे ‘शहर तो लाहौर का अनारकली बाजार हो रहा है..’। अहमद खान बताते हैं दद्दा उनके पिता हाजी दिलदार खां के दोस्त थे। वह दद्दा को बाबू जी बुलाते थे।
जमीन पर बैठकर खाना खा लेते थे दद्दा
बड़ी मस्जिद सीपरी के पेश इमाम हाफिज मो. रियाज खान बताते हैं कि वह अपने बुजुर्गों से सुनते आए हैं कि दद्दा बड़े सरल स्वभाव के थे। दोस्तों के साथ किसी की शादी ब्याह में जाते थे तो जमीन पर बैठकर खाना खाते थे, जब लोगों को पता लगता था कि वह ध्यानचंद हैं तो उन्हें आदर से बैठाया जाता था। वह कभी दिखावा नहीं करते थे।