भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ग्वालियर में रानी लक्ष्मीबाई की समाधि पर पुष्प अर्पित किए
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प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के डेढ़ शताब्दी से अधिक समय के बाद यह पहला मौका है जब ग्वालियर के सिंधिया राजवंश का कोई वारिस झांसी की रानी की प्रतिमा के समक्ष नतमस्तक हुआ है।
यूं तो मंत्री और नेताओं का क्रांतिवीरों की समाधियों पर जाकर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन करना एक सामान्य सी घटना है, पर सिंधिया राजवंश के वारिस और केंद्र सरकार के मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के शहादत स्थल पर जाकर उन्हें नमन करने को लक्ष्मीबाई की क्रांतिगाथा लिखने वाली कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की यह पंक्तियां, 'अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी', आम से खास बना देती हैं। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि सिंधिया का वीरांगना के प्रति श्रद्धाभाव नहीं था, पर इसे एक संयोग ही कहा जाएगा कि अब तक रानी की समाधि पर होने वाले कार्यक्रमों में सिंधिया परिवार की सार्वजनिक रूप से उपस्थिति नजर नहीं आई।
रानी लक्ष्मीबाई की समाधि पर उन्हें नमन करते ज्योतिरादित्य सिंधिया
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शनिवार को केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया स्वर्ण रेखा नाले पर बनने वाले पुल व सड़क का निरीक्षण करने के लिए महारानी लक्ष्मीबाई के शहादत स्थल पर गए थे। उनके साथ मध्यप्रदेश के मंत्री प्रद्युम्न सिंह भी थे। इसी दौरान सिंधिया ने महारानी लक्ष्मीबाई की समाधि के समक्ष पुष्प समर्पित कर उन्हें नमन किया।
इसके बाद से सियासी गलियारों से लेकर आम आदमी तक सिंधिया का यह कार्यक्रम चर्चाओं में है। लोगों का ऐसा कहना है कि यह पहला मौका है जब सिंधिया परिवार का कोई सदस्य झांसी की रानी को नमन करने पहुंचा है। हालांकि इस बात में कितनी सत्यता है, यह कह पाना मुश्किल है।
सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो भूला नहीं कहा जाता
ग्वालियर निवासी इतिहासकार डा. दिनेश मांझी का कहना है कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महारानी लक्ष्मीबाई जब झांसी से ग्वालियर पहुंचीं तो ऐसा कहा जाता है कि वहां के सिंधिया शासक ने उनकी मदद नहीं की थी, इसी के चलते वह शहीद हो गईं। हालांकि, इसका सबसे बड़ा साक्ष्य सिर्फ सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता को ही माना जाता है। इसमें कितनी सत्यता है, कुछ कहा नहीं जा सकता है। पर, अगर सत्यता है भी तो सुबह का भूला शाम को घर आ जाता है तो उसे भूला नहीं कहा जाता है।
बदले हुए भारत की पदचाप सुन रहे हैं सिंधिया
इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा का कहना है कि ऐसा नहीं है कि ज्योतिरादित्य पहली बार सांसद बने हों या फिर पहली बार मंत्री। इसके पहले भी वह ग्वालियर में सत्ता के केंद्र बिंदु रहे हैं, पर अंतर सिर्फ इतना है, कि पहले कांग्रेस में थे और अब भाजपा। भाजपा के बदलते भारत की पदचाप को सिंधिया महसूस कर रहे हैं। आज भाजपा राज में जहां सावरकर से लेकर आजाद और भगत सिंह की बलिदान गाथाओं को याद किया जा रहा है और मोदी स्वयं झांसी में जाकर वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के किले में उन्हें नमन कर रहे हैं, ऐसे में भाजपा के ज्योतिरादित्य सिंधिया का झांसी की रानी को नमन करना कोई हैरान करने वाली बात नहीं है।
सिर्फ सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता में ही है घटना का उल्लेख
रानी लक्ष्मीबाई कॉलेज के प्रोफेसर व इतिहासकार डा. सुशील कुमार का कहना है कि सिंधिया राजवंश व रानी लक्ष्मीबाई के बीच विवाद की बात का इतिहास में कहीं उल्लेख नहीं है। सिर्फ, सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता में ही इन दोनों के विवाद की बात का उल्लेख किया गया है। सुभद्रा कुमारी चौहान ने लिखा है, 'विजयी रानी आगे चल दी किया ग्वालियर पर अधिकार, अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।'