वीरांगना की धरा पर 90 साल जलती रही क्रांति की मशाल
झांसी। झांसी की धरा पर सन 1857 में वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई ने क्रांति की मशाल रोशन की थी, जो 1947 में देश के आजाद होने तक लगातार जलती रही। रानी के आजादी के मंत्र को यहां क्रांतिकारी पीढ़ी दर पीढ़ी गुनगुनाते रहे। झांसी ने जहां एक ओर गांधी जी द्वारा ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ छेड़े गए हर अहिंसक आंदोलन में अपनी सहभागिता सुनिश्चित की, तो वहीं गरम दल का नेतृत्व करने वाले चंद्र्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों का भरपूर साथ निभाया।
गुलाम हिंदुस्तान में आजादी की आवाज झांसी से वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई ने बुलंद की थी। 1857 के गदर में वीरांगना अंग्रेजी सेना से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गईं थीं, लेकिन वे विरासत में स्वराज्य का मंत्र छोड़ गईं थीं, जिसे झांसी के जन-जन ने अपने दिल में बसा कर रखा। यही वजह है कि जब 20 नवंबर 1920 को गांधी जी पहली बार झांसी आए, तो यहां लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत की परवाह किए गए बगैर उनका जोरदार स्वागत किया। गांधी जी द्वारा छेड़े गए असहयोग आंदोलन के दौरान झांसी के कोने-कोने में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गईं, तो नमक आंदोलन में नमक बनाने का काम भी किया गया। वरिष्ठ साहित्यकार जानकी शरण वर्मा ने बताया कि गांधीवादी आंदोलनों को रघुनाथ विनायक धुलेकर, आत्माराम गोविंद खैर, सीताराम भास्कर भागवत, कुंजबिहारी लाल शिवानी, अब्दुल रशीद, लक्ष्मण राव कदम, रामलाल पांडेय, लाड़ली प्रसाद श्रीवास्तव, दुर्गाप्रसाद सिद्ध, कृष्णगणेश खानवलकर, सीताराम आजाद, डा. गोविंद प्रसाद हिंगवासिया, बाबूलाल दुबे, सत्यदेव तिवारी आदि ने धार देने का काम किया।
वहीं, पं. परमानंद, सदाशिव राव मलकापुरकर, मास्टर रुद्रनारायण सिंह, विश्वनाथ गंगाधर वैशंपायन, भगवानदास माहौर, सालिगराम शुक्ल, मंगली प्रसाद रिछारिया, लक्ष्मीकांत शुक्ल, रामसेवक रावत, रतन, रुस्तम सैटिन जी, बाबूराम श्रीवास्तव, शंभूनाथ आदि क्रांतिकारियों ने चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों की अंग्रेजी शासन के विरुद्ध तैयार की गई योजनाओं को परवान चढ़ाने का काम किया।
आजाद ने झांसी में कई साल बिताए
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद ने कई साल झांसी में बिताए और वह काफी लोकप्रिय रहे। वह महानगर से लगभग 15 किलो मीटर दूर ओरछा के ठीक पहले सातार के जंगलों में रहे। यहां वह अन्य साथियों को निशानेबाजी का प्रशिक्षण दिया करते थे। साथ ही आस पास के ग्रामीण बच्चों को पढ़ाते भी थे। आजाद जी मुहल्ला टकसाल स्थित मास्टर रुद्र नारायण सिंह के यहां भी काफी समय तक रहे। इसके चलते यह क्षेत्र आज भी चंद्रशेखर आजाद मुहल्ला के नाम से जाना जाता है। चंद्रशेखर आजाद के शहीद होने के बाद उनके साथी उनकी माता जगरानी देवी को झांसी ले आए। उनके नाम की समाधि आज भी बड़ागांव गेट स्थित मुक्तिधाम पर है।