बुंदेलखंड के खेत सूखे और किसान अभी भी भूखे हैं। इसलिए किसानों की आत्महत्या का सिलसिला थम नहीं रहा है। 21 और 22 फरवरी को दो दिन में झांसी के बंगरा और मऊरानीपुर में तीन किसानों ने आर्थिक तंगी और फसल बर्बाद होने के कारण आत्महत्या की। क्षेत्र में आए दिन ऐसी खबर आ रही हैं। पानी की समस्या भी बरकरार है। विपक्षी ही नहीं, सत्तारूढ़ दल के विधायक भी इन समस्याओं को स्वीकार रहे हैं।
राग भले ही अलग हों, पर भाव एक ही है। समाजशास्त्री और अर्थशास्त्रियों के अनुसार खेतों की प्यास और अन्नदाताओं की भूख एक दूजे से जुड़े पहलू हैं। बुधवार को विधानसभा में इन दोनों मामलों की गूंज सुनाई दी। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने सदन में बुंदेलखंड में 850 किसानों द्वारा आत्महत्या और सिंचाई का मामला उठाया। गरौठा विधायक ने भी क्षेत्र में लगातार पानी की समस्या को उठाया।
इस संबंध में अर्थशास्त्री और बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के पूर्व प्रति कुलपति प्रोफेसर श्रीराम अग्रवाल ने कहा कि बुंदेलखंड समेत जिन भी क्षेत्रों जैसे विदर्भ और आंध्रा में ग्रामीण आबादी पूरी तरह कृषि पर निर्भर है और जहां प्राकृतिक संसाधन बहुत अनुकूल नहीं हैं, वहां किसानों की चुनौतियां बहुत बढ़ जाती हैं। जबकि, पंजाब सरीखे प्रांत अच्छी आबोहवा के कारण साल में तीन-तीन फसल का लाभ उठाते हैं।
बुंदेलखंड में सिंचाई के संसाधन कम हैं। फसलों से आमदनी बहुत कम होती है। इन सबके बीच भ्रष्टाचार बड़ी चुनौती है। सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए लोग मजबूरी में रिश्वत देते हैं। इसलिए, उन्हें योजना का पूरा लाभ नहीं मिलता। यह ऋण अदायगी को और चुनौतीपूर्ण बना देता है। इसलिए किसानों को कम पानी में अच्छी पैदावार वाली फसलों को अपनाना होगा। वहीं, सरकार को चाहिए कि सीमित संसाधनों के बावजूद वह लोगों को समय पर सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराएं। ऋण वितरण में सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार पर शिकंजा कसे। किसान रिश्वत देने से परहेज करें।
बीकेडी में समाजशास्त्र विभाग के डॉ. जितेंद्र तिवारी के अनुसार खेत में सिंचाई नहीं होने से पैदावार और आमदनी कम होती है। परेशान होकर किसान आत्महत्या कर लेते हैं। हालात के लिए वे खुद को जिम्मेदार मान लेते हैं। अपनी परेशानी परिजनों तक से साझा नहीं करते। आत्महत्या के मामले चिंता का विषय हैं। गरौठा क्षेत्र में दो वर्षों से नाम मात्र की बारिश हुई है। पिछले 15 वर्षों से सूखे के हालात हैं। क्षेत्र के लोगों को पानी खरीदकर पीना पड़ रहा है।
सिंचाई के लिए तो व्यवस्था ही नहीं हैं। मध्यप्रदेश से जो पानी आता है, वह नदियों में बह जा रहा है। हैंडपंप सूख गए हैं। किसान परेशान है। दो वक्त की रोटी की व्यवस्था करना चुनौती है। कई बार सरकार का ध्यान आकर्षित करने के बावजूद अभी तक समाधान नहीं निकला है। बुधवार को मामला विधानसभा में उठाया। आगे भी मुद्दे को उठाता रहूंगा।
जवाहर लाल राजपूत, विधायक गरौठा
पिछले दो वर्षों में उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के 850 किसान आर्थिक तंगी और फसल बर्बाद होने के चलते आत्महत्या कर चुके हैं। आज भी वहां सिंचाई के संसाधन नहीं हैं। सरकार एक के बाद एक घोषणा किए जा रही है। लाभ किसी को नहीं मिल रहा। सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ रहे हैं। हाल ही में झांसी में ही दो दिन में तीन किसानों ने आत्महत्या कर ली। मैंने बुधवार को विधानसभा में मामला उठाया। इस पर मुख्यमंत्री ने कहा कि उनके कार्यकाल में बुंदेलखंड में किसी किसान ने आत्महत्या नहीं की। यह संवेदनहीनता की हद है।
अजय कुमार लल्लू, प्रदेश अध्यक्ष कांग्रेस और विधायक
36 फीसदी खुदकुशी कर्ज, 25 फीसदी फसल बर्बाद होने के कारण
पुणे के गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स एंड इकोनोमिक्स की रिसर्च के अनुसार बुंदेलखंड में औसतन कर्ज के चलते 36.37 प्रतिशत किसानों ने आत्महत्या की। वहीं, फसल से कम आमदनी होने के कारण आत्महत्या करने वालों का आंकड़ा लगभग 25 प्रतिशत रहा।
झांसी-ललितपुर में आत्महत्या के कुछ मामले
बंगरा के पठारी खिरक में रहने वाला भजन लाल कुशवाहा (36) ने 21 फरवरी को आर्थिक तंगी से आजिज आकर खुदकुशी कर ली।
22 फरवरी को मऊरानीपुर क्षेत्र के ग्राम लखेश्वर में सोमवार को 55 वर्षीय किसान रामलाल रैकवार और उल्दन क्षेत्र के गांव घांघरी के किसान चंद्रभान (25) ने भी आर्थिक तंगी के कारण जीवन समाप्त कर लिया।
थाना लहचूरा निवासी लोकेंद्र सिंह दस बीघा का काश्तकार था। साढ़े तीन लाख कर्ज लेकर ट्रैक्टर लिया, लेकिन दुर्घटना के चलते वापस नहीं कर सका। दबाव में आकर उसने फंसी लगा ली।
मऊरानीपुर तहसील के ग्राम दुर्गापुर निवासी वृषभान खरीफ फसल होने के बाद कर्ज में डूब गया। फसल पूरी तरह खराब हो गई। उससे उबर न पाने पर परेशान वृषभान ने आत्महत्या कर ली।
बामौर ब्लॉक के कमल कुशवाहा के पास एक बीघा जमीन थी। किसी तरह गुजारा हो रहा था। साहूकारों का कर्ज न चुकाने की वजह से फांसी के फंदे पर झूल गया।
टोड़ीफतेहपुर निवासी ओमप्रकाश के पास तीन एकड़ जमीन है। फसल के लिए साहूकार से तीन लाख का ऋण लिया, चुका न पाने की वजह से जान दे दी।
ललितपुर के जाखलौन निवासी हुकुम सिंह ने दो फसली सीजन में डेढ़ लाख रुपये ऋण लिया, लेकिन चुका नहीं पाने की वजह से फांसी लगा ली।
ललितपुर के पाली निवासी जगन्नाथ भी फसली ऋण समय पर नहीं चुका सका। सूदखोरों से परेशान होकर पिछले माह वह फांसी के फंदे पर झूल गया।
ललितपुर के ग्राम मनकुवां निवासी किसान रतीराम कौशिक (50) ने आत्महत्या की थी। किसान के ऊपर चार लाख रुपये का केसीसी का कर्ज था। साढ़े तीन एकड़ जमीन है।
ललितपुर के ग्राम मनकुवां निवासी किसान अवदा सहरिया (50) ने आत्महत्या की थी। किसान के ऊपर ढाई लाख रुपये का केसीसी का कर्ज था। तीन एकड़ जमीन है।
ललितपुर के ग्राम गुरयाना निवासी किसान गणेश (48) ने आत्महत्या की थी। किसान के ऊपर तीन लाख रुपये केसीसी का कर्ज था। इसके अलावा साहूकारों का कर्ज था। चार एकड़ जमीन है।
झांसी के किसानों की अन्य मुश्किलें
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत वर्ष 2019-20 के ही 68 हजार से अधिक किसान वंचित।
बबीना, बंगरा, मऊरानीपुर, टहरौली, गरौठा क्षेत्र की हजारों एकड़ जमीन पूरी तरह बारिश पर निर्भर। बारिश हो गई तो बुवाई हो जाती है नहीं तो किसान असहाय रहता है।
बामौर, गुरसराय क्षेत्र के 1500 से अधिक किसान सिंचाई के संसाधन न होने की वजह से रबी की फसल की बुवाई नहीं कर सके।
2019-20 में दो लाख से अधिक किसान क्रेडिट कार्ड बने। तमाम किसान साहूकाराें के शिकंजे में फंस कर करोड़ों के कर्जदार हैं।
किसान सम्मान निधि के 16 हजार से अधिक मामले लंबित।