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दो साल में भी सुधर नहीं सकी फेको मशीन, मरीज टाल रहे ऑपरेशन

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झांसी। जिला अस्पताल के नेत्र रोग विभाग की फेको मशीन दो साल से खराब पड़ी हुई है। इस मशीन को सुधरवाने का दावा अस्पताल प्रशासन की तरफ से हर बार किया जाता है लेकिन अब तक ये हवाई ही साबित हुआ है। चूंकि, सर्दियों में ज्यादातर मरीज मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराते हैं। ऐसे में उन्हें निजी अस्पताल का रुख करना पड़ रहा है।
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आंख की पुतली व लेंस पूरी तरह पारदर्शी होते हैं। हम जो भी वस्तु देखते हैं, उसे कॉर्निया और लेंस से आंख के पर्दे पर फोकस किया जाता है। पर्दे की नस से दिमाग में संकेत जाते हैं। इससे हम किसी वस्तु को ठीक से देख सकते हैं। जब कभी हमारी आंख के लेंस में सफेदी या धुंधलापन जाता है तो इसे मोतियाबिंद कहते हैं। यदि मोतियाबिंद का समय रहते ऑपरेशन न कराया जाए तो अधिक पकने पर मोतियाबिंद जनित काला पानी होने का खतरा बना रहता है, जिससे आंख में तेज दर्द होता है।
आंख की रोशनी हमेशा के लिए जा सकती है। ज्यादातर लोग सर्दियों में ही मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराना पसंद करते हैं। हालांकि, नेत्र रोग विशेषज्ञ किसी भी मौसम में ऑपरेशन कराने की सलाह देते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर मरीज ऑपरेशन के लिए सरकारी अस्पताल का ही रुख करते हैं। ऐसे में पिछले दो साल से जिला अस्पताल की फेको मशीन खराब होना मरीजों के लिए बड़ी समस्या खड़ी कर रहा है। कई लोग फेको विधि से ही ऑपरेशन करना पसंद करते हैं। ऐसे में वह मशीन ठीक होने का इंतजार कर रहे हैं। वहीं, कई लोगों को निजी अस्पताल जाकर जेब ढीली करनी पड़ रही है।
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मोतियाबिंद के लक्षण
- बढ़ती उम्र के साथ नजर का कम होते जाना या धुंधलापन बढ़ते जाना।
- चश्मे का नंबर जल्दी-जल्दी बदलना।
- दिन के समय कम दिखना व रात या अंधेरे में अधिक दिखना।
- एक ही वस्तु कई-कई दिखाई देना।
ये हैं कारण
वृद्धावस्था: ये मोतियाबिंद सबसे अधिक पाया जाता है। प्राय: 50 साल की उम्र के बाद प्राकृतिक लेंस में धुंधलापन आने लगता है और व्यक्ति को धीरे-धीरे उम्र के साथ-साथ नजर कम पड़ने लगती है।
चोट लगना: आंख में चोट लगने के कारण लेंस धुंधला होने लगता है और मोतियाबिंद हो जाता है।
मेटाबोलिक मोतिया: इस प्रकार का मोतिया कुछ शारीरिक बीमारियों के कारण हो जाता है, जैसे मधुमेह और कैल्शियम या फास्फोरस की अधिकता हो जाना।
पैदायशी मोतिया: यदि किसी महिला को गर्भावस्था के दौरान रूबेला संक्रमण जैसी बीमारियों हो जाए तो नवजात शिशु में मोतियाबिंद होने की आशंका रहती है।
डेवलपमेंटल कैटरैक्ट: बच्चे के पैदा होने से लेकर युवावस्था तक इस प्रकार का मोतियाबिंद हो सकता है।
ऑपरेशन के ये भी हैं प्रकार
एसआईसीएस: इस विधि में आंख में चीरा लगाकर पूरा लेंस बाहर निकालकर उसके स्थान पर एक कृत्रिम लेंस (आईओएस) डाला जाता है।
फेक्ट्रोलेजर: यह अत्याधुनिक तकनीक है। इसमें मोतिया को तोड़ने का कार्य फेक्ट्रोलेजर द्वारा किया जाता है और टुकड़ों को बाहर निकालने का कार्य फेको से किया जाता है।
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फेको मशीन का एक पार्ट खराब है। इसको सुधरवाने के लिए पत्राचार किया जा चुका है। जल्द ही मशीन सुधरवा ली जाएगी। - डॉ. केके गुप्ता, सीएमएस, जिला अस्पताल।
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