अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। बुंदेलखंड के लोगों में फैटी लिवर की समस्या तेजी से बढ़ती जा रही है। चूंकि इसके शुरुआती लक्षण नजर नहीं आते हैं इसलिए दिक्कत बढ़ने पर पता चलता है। इसकी वजह अव्यवस्थित जीवनशैली, शराब, जंक फूड आदि हैं। मेडिकल कॉलेज में हुए शोध से पता चला है कि न सिर्फ मोटे बल्कि थायराइड व ब्लड प्रेशर रोगियों में आशंका ज्यादा होती है। इससे यह बीमारियां खतरनाक स्तर तक पहुंच जाती है।
मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. कुलदीप चंदेल ने बताया एनएएफएलडी (नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज) से लिवर में वसा जमा हो जाता है। इससे एसजीओटी और एसजीपीटी स्तर बढ़ता है, जो लिवर और दिल की कोशिकाओं की क्षति अथवा बीमारी का संकेत देता है। जिससे पाचन की दिक्कत, मधुमेह, उच्च रक्तचाप या उच्च कोलेस्ट्रॉल की दिक्कत बढ़ती है। शुरुआती लक्षण पता नहीं चल पाते हैं। जब फैटी लिवर का स्तर बढ़ जाता है, तो थकान, पेट दर्द आदि होने लगते हैं। इन समस्याओं को नजरअंदाज किया जाता है तो लिवर सिरोसिस का खतरा बढ़ जाता है। बुंदेलखंड में फैटी लिवर रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है, जिसकी वजह बेतरतीब जीवनशैली और खानपान है। मेडिकल कॉलेज में एक साल तक 302 लोगों पर शोध किया गया। 80 फीसदी मोटे लोगों का लिवर फैटी मिला। डायबिटीज के 46 फीसदी, कोलेस्ट्रॉल के 66 फीसदी, थायराइड व ब्लड प्रेशर के 40 फीसदी रोगियों में इसकी समस्या मिली है। पेट संबंधी दिक्कतें होने पर जांचें कराएं और फैटी लिवर की समस्या होने पर नियमित तौर पर इलाज कराएं। जीवनशैली में भी बदलाव करें।