अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। बीएनएस (भारतीय न्याय संहिता) लागू हुए दस माह बीत चुके लेकिन, पुलिसकर्मियों को अब तक बीएनएस की सही धाराओं का ज्ञान नहीं हो सका। केस दर्ज करने से लेकर विवेचना करने तक में मुंशी और दरोगा गलतियां कर रहे हैं। विवेचक किसी केस में अतिरिक्त जोड़ दे रहें हैं तो कुछ में खामियां छोड़ देते हैं। इस वजह से कोर्ट में पुलिस को किरकिरी भी झेलनी पड़ती है।
एक जुलाई 2024 को तीन नए कानून के तौर पर बीएनएस समेत भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) एवं भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए) लागू किए गए। तीनों कानून लागू होने से पहले थानेवार दरोगा, मुंशी, इंस्पेक्टरों को बाकायदा ट्रेनिंग दी गई। कई दरोगाओं को ट्रेनिंग के लिए बाहर भेजा गया। अब इन नई धाराओं में दर्ज मुकदमे कोर्ट के सामने पेश होने लगे लेकिन, कई मामलों में यह सामने आया कि विवेचकों ने सही तरीके से विवेचना नहीं की। जानकारों का कहना है कि मारपीट, दुष्कर्म, जान से मारने की धमकी देने, धोखाधड़ी को लेकर दर्ज होने वाले मुकदमों में यह खामियां मिल रही हैं। इसको लेकर भुक्तभोगी भी अफसरों से शिकायत कर रहे हैं। वहीं, एसपी सिटी ज्ञानेंद्र सिंह का कहना है कि ऐसे मामले कम आते हैं।
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मामूली चूक पड़ रही भारी
विवेचक सबसे अधिक गलती बीएनएस की धारा 351 के तहत दर्ज मुकदमों में कर रहे हैं। इसके तहत आपराधिक धमकी से संबंधित मामले दर्ज होते हैं। पुलिस ने कई गंभीर मामले में मुकदमा धारा 351(2) के तहत दर्ज कर लिया। इसमें आपराधिक धमकी देने में महज दो वर्ष की सजा का प्रावधान है। इसे बीएनएस की धारा 351 (3) के तहत दर्ज होना चाहिए था लेकिन, धाराओं में मामूली अंतर होने से यह चूक हो रही। इसी तरह जिसके मामले 351 2 के तहत दर्ज होने चाहिए, उनमें 351 3 के तहत रिपोर्ट दर्ज हो गई। ऐसे में जिसे दो साल की सजा मिलनी थी, उसके खिलाफ सात साल की सजा मामले में चार्जशीट बन गई हालांकि छानबीन के दौरान चूक उजागर होने पर इसे दुरुस्त कराया जाता है।
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गिरफ्तारी से पहले वीडियोग्राफी परेशानी का सबब
बीएनएस की नई धाराओं में गिरफ्तारी से पहले पुलिसकर्मियों के लिए वीडियोग्राफी को अनिवार्य किया गया है लेकिन, पुलिसकर्मियों के लिए यह गले की फांस बना हुआ है। गिरफ्तारी से पहले कई मामलों में वीडियोग्राफी नहीं हो पाती है।