सामजय नायक। तीज-त्योहारों की सदियों से चली आ रहीं परंपराएं अब विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी हैं। इन्हीं में से एक है दीपावली पर घर की चौखट पर कील ठुकवाने की परंपरा, जो अब पूरी तरह से विलुप्त हो चुकी है। इसके अलावा दीवार पर बनाई जाने वाली लक्ष्मी विष्णु की प्रतीक मानी जाने वाली सुराती की परंपरा को भी शहरों में लोग भूलते जा रहे हैं।
दीपावली के त्योहार की कई लोक मान्यताएं और परंपराएं हैं। इन्हीं में से एक घर की चौखट पर कील ठुकवाने की है। इसके पीछे मान्यता थी कि दीपावली के दिन गोधूलि बेला में घर के दरवाजे पर मुख्य द्वार पर लोहे की कील ठुकवाने से साल भर बलाएं घर में प्रवेश नहीं कर पातीं। इसके अलावा इससे जुड़ी एक अन्य मान्यता भी थी।
बुंदेलखंड संस्कृति के जानकार हरगोविंद कुशवाहा के मुताबिक कील ठुकवाना दीपावली पर लोहे को सम्मान देना है। लोहे से कृषि यंत्रों का निर्माण होता है। दिवाली के बाद रबी की फसल की बुवाई शुरू होती है, जिसमें ये यंत्र काम आते हैं। कील ठुकवाने की ये परंपरा अब गांवों में भी यदा-कदा ही देखने को मिलती है।
वहीं, दीपावली की पूजा के लिए दीवार पर सुराती बनाने की परंपरा भी अब बीते कल की बात होती जा रही है। नई पीढ़ी इसे बनाना भी नहीं जानती है। ये केवल पुरानी पीढ़ी तक सिमट कर रह गई है।
बुंदेली लोक कलाविद मधु श्रीवास्तव ने बताया कि सुराती स्वास्तिकों को जोड़कर बनाई जाती है। ज्यामिति आकार में दो आकृति बनाई जाती हैं, जिनमें 16 घर की लक्ष्मी की आकृति होती है, जो महिला के सोलह श्रृंगार दर्शाती है। नौ घर की भगवान विष्णु की आकृति नवग्रह का प्रतीक होती है। सुराती के साथ गणेश, गाय, बछड़ा व धन के प्रतीक सात घड़ों के चित्र भी बनाये जाने की भी परंपरा है, लेकिन अब ये कम ही नजर आती है।
हाथ से बने लक्ष्मी - गणेश के चित्र की होती है पूजा
दीपावली पर हाथ से बने लक्ष्मी - गणेश के चित्र की पूजा का भी विशेष महत्व है। जिन्हें बुंदेली लोक भाषा में पना कहा जाता है। यह चितेरी कला का हिस्सा है। कई घरों में आज भी परंपरागत रूप से इन चित्रों के माध्यम से लक्ष्मी पूजा की जाती है।