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धनतेरस: बन रहा शनि प्रदोष के साथ द्वादशी का विशेष संयोग, इस एक उपाय से टल जायेगी अकाल मृत्यु, होगी धन वर्षा

Sat, 18 Oct 2025 01:45 PM IST
दीपक महाजन अमर उजाला नेटवर्क, झांसी

सार

जिला धर्माचार्य विष्णु दत्त स्वामी के अनुसार इस दिन शनि प्रदोष के साथ द्वादशी का साथ होने से विशेष संयोग बन रहा है जो अति शुभकारी है। धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त 18 अक्तूबर को शाम 5:30 से 7:30 तक रहेगा। 
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धनतेरस - फोटो : freepik
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विस्तार
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धनतेरस पर भगवान धन्वतंरि, कुबेर और यम देवता की पूजा करने का विशेष महत्व होता है। जिला धर्माचार्य विष्णु दत्त स्वामी के अनुसार इस दिन शनि प्रदोष के साथ द्वादशी का साथ होने से विशेष संयोग बन रहा है जो अति शुभकारी है। धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त 18 अक्तूबर को शाम 5:30 से 7:30 तक रहेगा। 
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निरोगी काया के लिये धन्वंतरि की पूजा

धनतेरस के दिन समुद्र मंथन के समय अमृत से भरा हुआ कलश लेकर भगवान धंन्वतरि का प्रादुर्भाव हुआ था। जो अच्छे स्वास्थ्य और निरोगी काया के स्वामी माने जाते है। इसीलिये धरतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा का विशेष महत्व होता है। इस दिन विधि-विधान से धन्वंतरि की पूजा की जाती है।

यम दीप का महत्व

जिला धर्माचार्य विष्णु दत्त स्वामी ने बताया कि धनतेरस की संध्या काल के समय यम देव की विशेष पूजा होती है। इस दिन घर के मुख्य दरवाजे पर चारमुखी तेल का दीपक जलाया जाता है। यह चौमुखी दीपक यमराज को समर्पित है। धनतेरस पर यम के नाम का दीपक जलाने से परिवार में दीर्घायु और सुख-सुविधा का आशीर्वाद मिलता है। इससे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता। धनत्रयोदशी पर सोना-चांदी और इससे बनने आभूषण के खरीदने का विशेष महत्व होता है। ऐसी मान्यता है धनतेरस पर खरीदारी करने से इसमें आने वाले वर्ष में धन की वृद्धि होती है। 
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कुबेर धन और नौ निधियों के स्वामी

पुराणों के अनुसार कुबेर को धन का देवता माना जाता है। कुबेर ऋषि विश्रवा के पुत्र और लंकापति रावण के सौतेले भाई हैं। कुबेर का वास घर की उत्तर दिशा में होता है और ये भगवान शिव के परम भक्त और नौ निधियों के देवता माने जाते हैं। भगवान कुबेर की पूजा करने से धन-धान्य की वृद्धि होती है। माता लक्ष्मी के साथ कुबेर की पूजा की जाती है।

शनि प्रदोष व्रत

शनि त्रयोदशी का उल्लेख शिव पुराण में मिलता है। प्रदोष व्रत यदि सोमवार को पड़े तो उसे सोम प्रदोष, मंगलवार को पड़े तो भौम प्रदोष और यदि शनिवार को पड़े तो शनि प्रदोष कहा जाता है। तीनों में से किसी भी दिवस पर पड़ने से इस व्रत का महत्व बढ़ जाता है। भगवान शिव शनिदेव के गुरु हैं, इसलिए यह व्रत शनि ग्रह से संबंधित दोषों के निवारण के लिए भी उत्तम माना जाता है। द्वादशी भगवान विष्णू को समर्पित है तो वहीं, प्रदोष शिव जी को ऐसे शनि प्रदोष और द्वादशी से भगवान विष्णु, शिव और शनि की विशेष कृपा होती है।
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