ठाड़े रौंय दिलगीर हमारे गौने की तैयारी, कोऊ -कोऊ यार पछीते रौंबे, सो कोऊ- कोऊ तला के तीर हमारे गौने की तैयारी, जीवन के सच से रूबरू कराने वाला यह चेतावनी गीत देशराज पटैरिया के पसंदीदा लोकगीतों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर था। यह बात अलहदा है कि उन्होंने मंचों पर इसे न के बराबर ही गाया हो पर तन्हाई में अक्सर वह इस चेतावनी गीत को गुनगुनाते थे। शनिवार की अलसुबह उनके दिलगीर आंखों में आंसू लिए रह गए और देशराज गौने की तैयारी करके सबको छोड़कर चले गए। लोकगायक देशराज पटैरिया अब इस दुनिया मैं नहीं रहे पर उनके कालजयी लोकगीत बुंदेलखंड की फिजाओं में लंबे समय तक गूंजते रहेंगे।
देशराज पटैरिया के निधन के साथ ही बुंदेलखंड की लोकगायकी के एक युग का अंत हो गया। देशराज ने बुंदेली बोली के लोकगीतों को एक नया आयाम दिया. यह बात अलग है कि इसके पहले अमरदान और हरगोविंद विश्व जैसे लोक गायक टीसीरीज और एचएमवी जैसी बड़ी म्यूजिककंपनियों और आकाशवाणी तक बुंदेली लोकगीतों के माध्यम से पहुंच चुके थे, पर देशराज के मैदान में आने के बाद दूसरा कोई दिखाई ही नहीं दिया। जहां, प्यार, तकरार और हास्य की पुट लिए बुंदेली लोकगीतों से देशराज ने पूरे बुंदेलखंड में बुंदेली बोली का डंका बजा दिया वहीं उनके धार्मिक लोकगीत कालजयी हो गए।
जब लौ मोरी बहिन जानकी आंखन नहीं दिखानी, तब लौ मौ खौं ई मैड़े को पीने नइयां पानी
एक नादान बालक सीता जी को अपनी बहन और रामजी को अपना जीजाजी मान बैठता है और वह उनके दर्शन के लिए अन्न जल का त्याग कर देता है, इसी विषय वस्तु पर गाया गया देशराज का लोकगीत- जब लौ मोरी बहिन जानकी आंखन नहीं दिखानी तब लौ मौ खौं ई मैड़े को पीने नइयां पानी, आज भी लोगों की आंखों को नम कर देता है। देशराज द्वारा गाया गया हरदौल चरित भी बुंदेलखंड के गली चौपालों तक अपनी पैठ रखता है।
जवाबी कीर्तन से शुरू हुआ सफर लोकगीत सम्राट तक पहुंचा
नौगांव तहसील के तिंदनी गांव में जन्मे देशराज पढ़ाई के लिए छतरपुर पहुंचे और यहीं इनकी मुलाकात हुई कीर्तन व लोकगीत लिखने वाले मनहर चंचल से। चंचल राधा माधव के नाम से कीर्तन मंडल चलाते थे, इसमें देशराज भी शामिल हो गए। रात- रात भर होने वाले जवाबी कीर्तनों में देशराज की गायकी निखर गई और वह मनहर चंचल के सबसे चहेते गायक बन गए। उसी दौर में देश की कुछ बड़ी म्यूजिक कंपनियों ने हरगोविंद विश्व व अमरदान को लेकर रिकार्ड जारी किए, इनमें हरगोविंद का उतार दइयो लाला गगरी दैंहों नैग तुम्हारों काफी हिट हुआ। उधर, आकाशवाणी छतरपुर भी लोक गायकों को लगातार मौके दे रहा था। चंचल का ध्यान जवाबी कीर्तन से हटकर लोकगीत की ओर गया तथा उन्होंने लोकगीत लिखना शुरू किया। इन गीतों को आवाज दी देशराज ने, ज्यादा समय नहीं लगा और देशराज बुंदेलखंड के गांव गलियों के साथ ही मंचों पर छा गए।
इन गीतों पर खड़े होकर बजाते थे लोग सीटियां
चलीं गौरी मेला खौं साइकिल पै बैठ कैं, जीजाजू चल रए मूंछै दोऊ ऐंठ कैं, इसी तरह वैरन हो गई जुंदइया मैं कैसी करों, दिन की बैरन सास ननंदिया, रात की वैरन जुंदइयां में कैसी करौं इन लोकगीतों ने पूरे बुंदेलखंड में धूम मचा दी थी, बसों से लेकर चाय पान की दुकानों तक यह गीत सुनाई देते थे। इसके बाद कुछ द्विअर्थी लोकगीतों ने भी मंचों के मैदानों पर जमकर हंगामा किया। इसके बाद देशराज बुंदेलखंड के स्टार बन चुके थे। जल विहार हो या नवरात्र के कार्यक्रम जहां भी देशराज जाते हजारों की भीड़ एकत्र हो जाती।
ईश्वर और गुरु की कृपा को मानते थे सर्वोपरि
देशराज ईश्वरवादी थे, जब भी उनसे बात की जाती कि आप पढ़ाई के दौरान गीत गाते रहे फिर सरकारी नौकरी कैसे लग गई, तो उनका कहना होता था कि ईश्वर का गुणगान और गुरु की आज्ञा का पालन करने से ही मुझे आशीर्वाद स्वरूप सरकारी नौकरी मिली है। वह मलेरिया विभाग में कार्यरत थे। मंच पर भी वह अपने गुरु मनहर चंचल का हमेशा नाम लिया करते थे।
देशराज के दो चेहरे
देशराज मंच पर जिस तरह के हास्य और श्रृंगार में डूबकर लोगों के बीच धमाल मचाते थे, निजी जिंदगी में वह इतने ही संजीदा थे। संगीत की रिहर्सल हो या फिर कार में सफर, उस दौरान जो गीत वह गुगुनाते थे, वह मंच से एकदम अलग होते थे। इन गीतों में जीवन का दर्शन और सार होता था। ईसुरी की चेतावनी चौकड़ियां और बृषभानु कुंअर के पद उनकी निजी पसंद थे, पर मंच पर लोगों के हंगामे और फरमाइशों के आगे देशराज अपनी पसंद के नहीं जनता की पसंद के गीत गाने को मजबूर हो जाते थे, और इसी के चलते उन पर फूहड़ गीत गाने के भी आरोप लगे।