झांसी। साइबर क्रिमिनल तेजी से अपना दायरा बढ़ा रहे हैं। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पिछले एक साल के भीतर साइबर अपराधी जिले के 400 लोगों को अपना शिकार बना चुके हैं। इन लोगों से नए-नए पैंतरे अपनाकर दो करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम ठगी जा चुकी है। किसी के खाते से अपराधियों ने पैसे उड़ा दिए, तो किसी को सोशल मीडिया पर इज्जत नीलाम करने का भय दिखाकर ठगी की। इनमें कम ही ऐसे खुशकिस्मत लोग हैं, जिन्हें अपनी खोई हुई रकम वापस मिल पाई।
साइबर अपराध को रोकने में पुलिस नाकाम साबित हो रही है। जिले में हर माह औसतन 30-35 लोगों को साइबर अपराधी अपना शिकार बनाते हैं। वे लगातार नए-नए हथकंडे अपना रहे हैं। पहले बैंक खाते का डिटेल इकट्ठा कर खाते से रकम उड़ा दी जाती थी। साथ ही एटीएम कार्ड का क्लोन तैयार कर सैकड़ों लोगों को अपराधियों ने चूना लगाया। अब न्यूड कॉल के जरिये ब्लैकमेल करने के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। साइबर अपराधी सोशल मीडिया पर इज्जत नीलाम करने की धमकी देकर लोगों से पैसा ऐंठ रहे हैं। फेसबुक आईडी हैक कर मदद के नाम पर पैसा अकाउंट में डलवा रहे हैं। हाई प्रोफाइल लोग भी साइबर अपराधियों के इस हथकंडे का शिकार हो रहे हैं। पिछले महीने साइबर अपराधियों ने पूर्व सांसद चंद्रपाल सिंह यादव की फेसबुक आईडी हैक कर ली थी। इस मामले में सीपरी थाने में मुकदमा दर्ज किया गया हैै। ऑनलाइन शॉपिंग, सोशल प्लेटफार्म पर जाकर पुरानी गाड़ी व अन्य चीजें बेचने के नाम पर ठगी के भी मामले आए दिन सामने आते रहते हैं। फेसबुक आईडी हैक कर मदद के नाम पर पैसे मांगने के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। इनमें से ज्यादातर मामलों में शिकायत दर्ज नहीं हो पाती है। एफआईआर कायम होने के बाद कम ही मामलों में ही रिकवरी हो पाती है।
झांसी। साइबर अपराध का शिकार होने के बाद यशस्वी के पिता जगमोहन पाराशर ने इसकी शिकायत पुलिस से की थी। लेकिन, पुलिस ओर से न तो मुकदमा दर्ज किया गया और न ही पैसा वापस दिलाने की दिशा में कोई कार्रवाई हुई। यदि पुलिस समय पर हरकत में आ जाती, तो शायद यशस्वी आत्मघाती कदम नहीं उठाती।
साइबर अपराध का शिकार होने के बाद फांसी लगाकर जान देने वाली यशस्वी पाराशर के पिता जगमोहन पाराशर ने घटना की शिकायत एक माह पहले 19 जून को पुलिस से की थी। उन्होंने पुलिस को बताया था कि कुछ लोगों ने बेटी को नौकरी दिलाने के नाम पर ऑनलाइन ठगी कर ली है। अलग-अलग बहाने से उनसे ये रकम किस्तों में बैंक में जमा कराई गई है। कभी लैपटॉप के नाम पर रकम बैंक में जमा कराई गई तो कभी जीएसटी के नाम पर। कुल 48,500 रुपये साइबर अपराधी उनसे झटक चुके हैं। उन्होंने पुलिस से आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई कर खोई हुई रकम वापस दिलाने की मांग की थी। लेकिन, न तो मामला दर्ज किया गया और न ही ठगी गई रकम को वापस दिलाने के लिए कोई कार्रवाई हुई। यशस्वी के मामले में यदि पुलिस समय रहते एफआईआर कायम कर कार्रवाई कर देती तो शायद एक पिता को अपनी बेटी नहीं खोनी पड़ती।