झांसी। कोरोना काल में पिछले वर्ष लॉकडाउन में जिंदगी बचाने के लिए लोग जब करोड़ों का कारोबार और लाखाें की नौकरी छोड़कर घर बैठे थे, तब कई गुमनाम लोग अपनी व अपने परिजनों की चिंता को दरकिनार कर हाथ ठेलों, परचून दुकानों के माध्यम से और आटा चक्की खोलकर लोगों की भूख मिटाने का काम कर रहे थे। तनाव भरे उन दिनों में कई बार इन्हें लोगाें की दुत्कार और पुलिस की फटकार भी मिलती थी। बिना विचलित हुए इन्होंने आटा, दाल, चावल, सब्जी जैसी घर-घर की बुनियादी खाद्य जरूरतों को पूरा किया। तमाम सरकारी अफसर और कर्मचारियों को अपना फर्ज निभाने के लिए कोरोना योद्धा समेत तमाम सम्मान मिले, मिलने भी चाहिए थे। इस सबसे इतर नाममात्र की पूंजी वाले इन लोगों को न कोई विशेष सम्मान मिला, न ही उन्हें इसकी ख्वाहिश थी। यह तो बानगी भर हैं। महानगर में करीब आठ सौ हाथ ठेला सब्जी विक्रेता और एक हजार से अधिक परचून दुकानदार और किराना व्यापारी हैं।
कनटेनमेंट जोन में भी सब्जी उपलब्ध कराता था
मसीहागंज निवासी मुन्ना केवट (50) पिछले 32 वर्षों से ठेले पर सब्जी बेचते हैं। बताया, मात्र 17 रुपये की पूंजी से सब्जी बेचना शुरू की थी। लॉकडाउन चुनौती भरा था। घर वाले कहते थे कि संक्रमण फैल रहा है, तुम घर-घर जाकर सब्जी बेचोगे, क्या चपेट में नहीं आओगे। उन्होंने समझाया कि क्या बिना सब्जी के लोग रह सकते हैं। खाना तो खाएंगे ही। मास्क लगाकर, ग्लब्स पहनकर और सैनिटाइजर की बोतल ठेले पर रखकर उन्होंने घर-घर जाकर सब्जी बेची। उन दिनों सब्जी बहुत सस्ती हो गई थी। मुनाफे का लालच था ही नहीं। उन्होंने बताया घर वालों को नहीं बताता था फौजी चौराहा आवास विकास कंटेनमेंट जोन में जाकर भी बल्लियों के उधर रहने वालों तक सब्जी पहुंचाता था। सीपरी बाजार थाना इंचार्ज ने इसमें सहयोग किया था।
बाहर के स्टूडेंट पेट भरने के लिए मैगी, बिस्कुट, नमकीन ले जाते थे
सीपरी बाजार क्षेत्र में 21 वर्षों से किराना दुकान चला रहे मनोज कुमार जैन (51) मूलरूप से आगरा निवासी हैं। लॉकडाउन में भी उन्होंने नियमित अपनी दुकान खोली। जबकि लॉकडाउन से ठीक पहले आगरा में उनके पिता की मौत हो गई थी। तमाम मुश्किलों से वे झांसी आ सके थे। उन्होंने बताया कि बेटा अपनी दादी के पास आगरा में ही रहता है। एमसीए कर लिया है। लॉकडाउन के दौरान दुकान पर आने वाले बाहर के स्टूडेंट को देखकर बेटा याद आता था। यही लगता था कि अपने घरों से दूर ये कैसे अपना पेट भर रहे होंगे। होटल, टिफिन सप्लाई सब बंद हैं। बेचारे पेट भरने के लिए बड़ी तादाद में बिस्कुट, नमकीन व मैगी खरीद कर ले जाते थे। दुकान खोलने का यही सुकून था कि कम से कम भूखे तो नहीं सोएंगे।
कैसे बंद कर देता चक्की, भूख से कौन लड़ सकता है
जर्मनी अस्पताल के पास आटा चक्की चलाने वाले मनोज कुमार गुप्ता (48) ने बताया बहुत ही चुनौती भरा था लॉकडाउन। सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहता था। चक्की खोलने का तय समय था। उसी दौरान पिसाई करनी होती थी और ऑर्डर भी पूरे करने होते थे। दुकान पर भीड़ नहीं लग सकती थी। लोगों के घरों में आटा नहीं होने से वे दुकान खुलते ही आ जाते थे। यही हाल दुकानदारों का रहता था। वो समय याद करके आज भी डर लगता है। परिवार वाले कहते थे कि महामारी है, तुम भी कुछ दिन दुकान बंद रखो। मैंने उन्हें कहा कि और दुकानों और आटा चक्की में बहुत फर्क है। लोग बिना आभूषण, नए महंगे कपड़ों के रह सकते हैं। लेकिन भूख से कौन और कब तक लड़ेगा।