झांसी। सरकार ने भले ही निजी अस्पतालों में कोरोना मरीजों के इलाज की दरें निर्धारित कर रखी हैं। लेकिन, शासन का ये आदेश कागज में दर्ज इबारत भर बनकर रह गया है। हकीकत में हालात इससे एकदम इतर हैं। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि मरीजों को अस्पताल के खर्च के अलावा दवाओं पर चार-चार लाख रुपये तक खर्च करने पड़ जा रहेे हैं। लोग कर्ज लेकर अपनों का इलाज करा रहे हैं। संक्रमण लोगों की सेहत के साथ-साथ उनकी माली हालत पर भी गहरी चोट कर रहा है।
शहर के एक कारोबारी के 72 वर्षीय पिता कोरोना वायरस के संक्रमण की चपेट में आ गए थे। 26 अप्रैल को उन्हें मुश्किल से तमाम सिफारिशों के बाद एक अस्पताल में दाखिला मिल पाया था। यहां वे आठ मई तक भर्ती रहे। तबीयत में सुधार होने पर उनकी छुट्टी कर दी गई। दो दिन ही वे घर पर रहे और उनकी मौत हो गई। कारोबारी ने अपने पिता के इलाज पर लगभग दस लाख रुपये खर्च किए। इसमें से तकरीबन चार लाख रुपये दवाओं और इंजेक्शन का खर्चा आया। जबकि, इस खर्च में रेमडेसिविर इंजेक्शन शामिल नहीं है। कारोबारी ने बताया कि जिस इंजेक्शन पर एमआरपी (अधिकतम विक्रय मूल्य) 800 रुपये अंकित रहती थी, वो उन्होंने ढाई-ढाई हजार रुपये में खरीदा। कमोबेश आवश्यक दवाओं पर भी इसी तरह रकम खर्च करनी पड़ी। ये स्थिति तब थी, जब मेडिकल लाइन में उनकी अच्छी पहचान है। वरना, उन्हें इससे भी अधिक खर्च करने पड़ जाते। ये केवल एक मरीज के परिजन की आपबीती नहीं है, बल्कि तमाम मरीज इन हालातों से गुजर रहे हैं। सरकार की ओर से भले ही निजी अस्पतालों में इलाज की दरें तय कर रखी हैं, लेकिन इसका पालन नहीं हो रहा है। सामान्य मध्यवर्गीय परिवारों की कोरोना का इलाज कमर तोड़ दे रहा है। अपने परिजन के इलाज के लिए उन्हें मजबूरी में कर्ज तक लेना पड़ रहा है। अस्पतालों से मरीज के परिजनों को दवाओं व इंजेक्शनों का पर्चा थमा दिया जाता है, इनका इंतजाम करने में परिजन यहां-वहां दौड़ते नजर आते हैं। किसी मेडिकल स्टोर पर कोई दवा मिलती है, तो किसी पर कोई इंजेक्शन, ज्यादा दाम अदा करने के बाद भी उनके लिए पर्चे पर लिखीं सभी दवाओं व इंजेक्शनों का इंतजाम करना आसान नहीं होता है।
डिस्चार्ज होने के बाद भी 32 हजार की दवाएं
झांसी। ग्वालियर रोड निवासी एक युवा प्रोफेशनल मय पत्नी के कोरोना वायरस के संक्रमण की चपेट में आ गए थे। पहले होम आइसोलेशन में रहकर वे अपना इलाज करते रहे। लेकिन, हालत में सुधार न होने पर दोनों अस्पताल में दाखिल हो गए। तीन दिन तक दोनों अस्पताल में भर्ती रहे। छुट्टी होने पर उन्हें दवा का पर्चा थमा दिया गया। ये दवाएं उन्हें घर पर रहकर खानी हैं, जिनकी कीमत उन्हें 32 हजार रुपये अदा करनी पड़ी।
नकद भुगतान, नहीं मिलता बिल
झांसी। बड़ाबाजार के एक कारोबारी के छोटे भाई पिछले दिनों कोरोना वायरस के संक्रमण की चपेट में आ गए थे। इलाज के लिए उन्हें एक निजी अस्पताल में दाखिल कराना पड़ गया था। इलाज पर लगभग छह लाख रुपये का खर्च आया। इसमें से दवाइयों पर उन्होंने लगभग ढाई लाख रुपये खर्च किए। कारोबारी ने बताया कि उनका पूरा दिन दवाओं के इंतजाम में गुजरता था। मेडिकल स्टोर पर नकद भुगतान करना होता था। डिजिटल पेमेंट नहीं लिया जाता था। साथ ही दवाओं का कोई बिल भी नहीं दिया जाता था।