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कोरोना ने खराब कर दिए फेफड़े, अब ट्रांसप्लांट से ही बचा सकती जिंदगी

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कोरोना ने खराब कर दिए फेफड़े, अब ट्रांसप्लांट से ही बच सकती है जिंदगी
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झांसी। कोरोना वायरस ने कई मरीजों के फेफड़े इस कदर खराब कर दिए हैं कि अब उनके सामने ट्रांसप्लांट का ही विकल्प बचा है। महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में भर्ती चार मरीजों से भी डॉक्टरों ने लंग्स ट्रांसप्लांट कराने की बात कह दी है। एक-दो महीने से ये मरीज ऑक्सीजन सपोर्ट पर जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं। काफी महंगा इलाज होने की वजह से फेफड़े का प्रत्यारोपण कराना हर किसी के बस में भी नहीं है। जबकि गंभीर संक्रमण झेल रहे दस से ज्यादा मरीज दिल्ली के अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं।
कोरोना वायरस का कहर कई परिवारों पर टूटा है। अब भले ही दूसरी लहर बिल्कुल थम चुकी हो मगर संक्रमण की चपेट में आ चुके कई मरीजों पर से अभी भी खतरा टला नहीं है। दरअसल, कोरोना से मुक्त होने के बाद इन मरीजों पर पोस्ट कोविड डिजीज काफी भारी पड़ गई है। कुछ मरीजों के फेफड़े लगभग पूरी तरह से खराब हो गए हैं। इन मरीजों को हाई फ्लो ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया है। डॉक्टरों ने बताया कि तीन महीने तक ऑक्सीजन पर रहते हुए जितने फेफड़े ठीक होने होते हैं, उतने हो जाते हैं। कई मरीजों का ऑक्सीजन पर रहते हुए दो महीने से भी ज्यादा समय हो गया है। ऐसे में डॉक्टरों को फेफड़ों में सुधार की गुंजाइश न के बराबर है। इस कारण चार मरीजों को लंग्स ट्रांसप्लांट की सलाह दी गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक एक तरफ के लंग्स ट्रांसप्लांट कराने में 30-35 लाख से दोनों में 70 लाख से लेकर एक करोड़ रुपये तक का खर्च आ सकता है। ऐसे में हर कोई प्रत्यारोपण नहीं करा सकता।
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मृत डोनर के दान किए अंग से होता प्रत्यारोपण
हार्ट ट्रांसप्लांट की तरह ही फेफड़े का प्रत्यारोपण भी किसी मृत डोनर द्वारा दान किए गए अंग के जरिए ही संभव है। हालांकि, मरने के बाद फेफड़े दान करने वालों की भारी कमी है। दुनिया में पहला लंग ट्रांसप्लांट अमेरिका में 1963 में किया गया था लेकिन ज्यादा सफलता आज तक मिल नहीं सकी है।
वर्जन..
मेडिकल कॉलेज में कोरोना संक्रमित रहे चार मरीज ऐसे भर्ती हैं, जिनके फेफड़े बुरी तरह से खराब हो चुके हैं। ये मरीज वो है, जो 80 या इससे कम ऑक्सीजन लेवल पर भर्ती हुए। हम उन्हें हर संभव इलाज दे रहे हैं। मगर इनके सामने लंग्स ट्रांसप्लांट का ही विकल्प बचा हुआ है। मरीजों को भी इस संबंध में जानकारी दे दी गई है। - डॉ. रामबाबू सिंह, मेडिसिन विभागाध्यक्ष एवं क्रिटिकल केयर इंचार्ज, मेडिकल कॉलेज।
ये हैं मामले
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केस-1
52 साल के एक डॉक्टर 17 मई को बुखार और सांस लेने की समस्या के साथ मेडिकल कॉलेज में भर्ती हुए। उनकी आरटीपीसीआर रिपोर्ट पॉजिटिव आई। वह पहले से ही हाइपरटेंशन और कोरोनरी आर्टरी डिजीज से ग्रसित रहे हैं। लगातार एक्सरे जांच में पता चला कि उन्हें निमोनिया हो गया है। दो महीने के बाद भी वो वाईपैप मशीन पर ऑक्सीजन सपोर्ट पर हैं। वह लंग्स फाइब्रोसिस से पीड़ित हैं। पूरी तरह फेफड़े खराब हैं।
केस-2
13 मई को रक्सा की 50 साल की महिला मेडिकल कॉलेज में भर्ती हुई। वह कोरोना पॉजिटिव थी और सीटी स्कैन कराने पर स्कोर 40 में 28 आया। भर्ती के दौरान उनका ऑक्सीजन लेवल 80 प्रतिशत था। उन्हें 15 लीटर ऑकसीजन सपोर्ट पर रखा गया। उनकी ऑक्सीजन की मांग बढ़ती गई। एक्सरे में पता चला कि उनके फेफड़े बुरी तरह खराब हो चुके हैं। फेफड़े खराब हो जाने के चलते दो महीने बाद भी वो ऑक्सीजन सपोर्ट पर हैं।
केस-3
सांस लेने में समस्या होने पर महोबा निवासी 45 साल की महिला 27 मई को मेडिकल कॉलेज में भर्ती हुई, तब ऑक्सीजन लेवल 72 प्रतिशत था। जांच कराने पर सीटी स्कोर 40 में 34 आया। तुरंत ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया। सात दिनों के बाद महिला को हाई फ्लो ऑक्सीजन मशीन पर रखना पड़ गया। 11 जून को फिर से सीटी स्कैन कराया गया तो स्कोर 40 में 37 पहुंच गया। अभी महिला ऑक्सीजन सपोर्ट पर है। फेफड़े खराब हैं।
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केस-4
26 वर्षीय युवती को 14 जून को मेडिकल कॉलेज में बुखार और सांस की समस्या पर भर्ती किया गया। एंटीजन किट से जांच में वह कोरोना पॉजिटिव मिली। ऑक्सीजन लेवल 78 प्रतिशत था। मरीज को तुरंत ऑक्सीजन लगा दी गई। लगातार एक्सरे कराने पर महिला में निमोनिया की पुष्टि हुई। लगभग एक महीने बाद भी वो 15 लीटर प्रति मिनट ऑक्सीजन सपोर्ट पर है। डॉक्टरों ने लंग्स ट्रांसप्लांट कराने की सलाह दी है।
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