झांसी। पानी का बड़ा संकट है। आधा शहर इस समस्या से जूझ रहा है। लेकिन खास बात यह है कि माननीयों ने कभी इस तरफ ध्यान नहीं दिया। अगर प्रयास होते तो समस्या का कोई समाधान तो होता। कहने को तो क्षेत्र में हैंडपंप भी लगे हैं, लेकिन ये सिर्फ नाम के हैं। इनमें पानी नहीं आता। नलों का कोई भरोसा नहीं है। इस कारण लोगों को पेयजल के लिए टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ता है। यही वजह है कि टैंकर के इंतजार में लोग काम धंधा बंद कर डिब्बा लेकर बैठ जाते हैं।
वार्ड नंबर 48 भांडेरी गेट क्षेत्र महानगर का पुराना इलाका है। यह मुस्लिम बहुल क्षेत्र है। यहां पर अधिकांश लोग छोटा- मोटा कारोबार करते हैं। कोई सब्जी का कारोबार करता है, कोई आटो रिक्शा चलाता है तो कोई पल्लेदारी करता है। कुल मिलाकर मेहनतकश लोग हैं। इन्हें जितनी मेहनत अपने काम में करनी पड़ती है, कहीं उससे अधिक मेहनत पीने के पानी के लिए करनी पड़ती है। इस क्षेत्र में आसपास छह हैंडपंप लगे हैं, लेकिन सभी खराब हैं। मोहल्लेवासी कह- कह कर हार गए, लेकिन कोई हैंडपंप नहीं सुधरा। भांडेरी गेट अंदर लच्छी का बगीचा क्षेत्र में पांच से आठ हजार लोग रहते हैं। पीने के पानी के लिए इनके आसपास कोई साधन नहीं है। पानी की पाइप लाइन डली है, लेकिन आधी- अधूरी, इसलिए कहीं पानी आता है, कहीं नहीं आता है। क्षेत्र में पानी की टंकी बन रही है, लेकिन इस टंकी का लाभ लोगों को अम्रुत योजना शुरू होने के बाद मिलेगा। लोगों ने पानी को स्टोर करने के लिए ड्रम घरों के बाहर रख लिए हैं, टैंकरों से आने वाले पानी से ही यह रोजमर्रा के जरूरी काम करते हैं। हालांकि, लोगों का कहना है कि टैंकरों से कभी- कभी गंदा पानी भी आता है, लेकिन उन्हें शिकायत नहीं है।
कोई परवाह नहीं
भांडेरी गेट के लोगों की शिकायत है कि यहां के जनप्रतिनिधियों को उनकी परवाह नहीं है। यदि परवाह होती तो कम से कम एक बार यहां के लोगों की समस्याएं देखने जरूर आते। यहां न पानी है और न ही अन्य कोई सुविधा है। लोगों ने अतिक्रमण कर रखा है, जिससे रास्ते में आने- जाने वालों को परेशानी होती है। अधिकारी कोई आता नहीं है, कम से कम एक बार अधिकारी क्षेत्र का भ्रमण करके हकीकत देख लेते तो काफी हद तक समस्या का समाधान हो जाता।
अतिक्रमण के कारण होती है टैंकर को परेशानी
मोहल्ले में अतिक्रमण होने के कारण टैंकर लेकर आने वाले ट्रैक्टर को परेशानी का सामना करना पड़ता है। पिछले दिनों इसी चक्कर में एक टैंकर का धक्का ऑटो में लग जाने के कारण दो हजार रुपये हर्जाना टैंकर ड्राइवर को देना पड़ा था।
आसपास लगे छह हैंडपंप खराब पड़े हैं। नलों की लाइन आगे नहीं डाली गई है। पानी कहीं मिल नहीं रहा। केवल टैंकर के भरोसे हैं। यदि आसपास के हैंडपंप ही सुधर जाते तो कम से कम पीने के लिए परेशानी तो नहीं होती।
- मकसूद
कोई सुनने वाला नहीं है। सब से कह चुके, लेकिन हैंडपंप सही नहीं हुए। हैंडपंप से पानी आसानी से मिल जाता था। अब टैंकर पर निर्भर हैं। जितना पानी मिल जाए उसी से काम चलाते हैं।
- अरबाज
टैंकर तो आते हैं, लेकिन उसके लिए इंतजार करना पड़ता है। सब काम छोड़कर टैंकर के लिए बैठ रहते हैं। एक बार में तो पानी भर नहीं पाता, क्योंकि कई लोग टैंकर से पानी भरते हैं।
- नफीस राइन
मोहल्ले में टंकी तो बन रहीहै, लेकिन पाइप लाइन अभी नहीं डली है। यदि पाइप लाइन डल जाए तो लोगों को उम्मीद बढ़ जाएगी। टंकी का काम भी बहुत धीमी रफ्तार से चल रहा है।
- बशीर खान
डिब्बे और ड्रम भरना पड़ते हैं। क्या पता कब तक पानी के लिए इंतजार करना पड़ जाए। कम से कम अधिकारियों को इस बारे में सोचना चाहिए कि पानी जैसी आम जरूरत को पूरा कर दें।
- इमरान खान
कोरोना के कारण भीड़ में जाने से डर लगता है, लेकिन मजबूरी है कि पानी भरना पड़ता है। टैंकर आने से एक साथ लोगों की भीड़ टूट पड़ती है। सबको पानी भरने की जल्द रहती है।
- बिसमिल्ला बेगम