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कोरोना काल में दोगुनी हो गई बच्चों में हड्डियां कमजोर होने की बीमारी

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झांसी। कोरोना काल में पहले लॉकडाउन और फिर अनलॉक में संक्रमण के डर से माता-पिता ने बच्चों को घर पर ही रखा। स्कूल, कॉलेज भी बंद रहे, तो बच्चों ने ऑनलाइन ही पढ़ाई की और इंडोर गेम्स खेले। ऐसे में धूप से मिलने वाला विटामिन डी पर्याप्त मात्रा में बच्चों के शरीर में नहीं पहुंच सका। इस कारण बच्चों में हड्डियां कमजोर होने के मामले दोगुनी रफ्तार से बढ़े। अब जरा-जरा सी चोट लगने पर बच्चों की हड्डियां चटक रही हैं।
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बदली हुई जीवनशैली में बच्चों के साथ बड़ों में भी पहले से ही विटामिन डी की कमी कर दी है। कोरोना काल में इसमें तेजी से बढ़ोतरी हुई है। 90 फीसदी विटामिन डी जिसे कैल्शिफरोल के रूप में भी जाना जाता है, इसकी शरीर को आवश्यकता होती है। परबैंगनी किरणें से त्वचा का संपर्क होने से त्वचा में प्रोविटामिन डी में बदलता है। रक्त के जरिए यकृत में जाता है और हाईड्रॉक्सी विटामिन डी में परिवर्तित करता है। इससे शरीर में कैल्शियम का संतुलन बना रहता है। साथ ही हड्डियां भी मजबूत रहती हैं। कोविड के चलते पहले लॉकडाउन और फिर अनलॉक में ऑनलाइन पढ़ाई के चलते बच्चे घरों में ही कैद होकर रह गए। इंटरनेट और मोबाइल पर बच्चों को ज्यादा समय बीता। इस कारण उनके शरीर को पर्याप्त मात्रा में धूप नहीं मिल सकी। इस वजह से विटामिन डी की कमी और बढ़ गई। कोरोना दौर में अब पहले की तुलना में मेडिकल कॉलेज के हड्डी रोग विभाग में बच्चों में हड्डियों की कमजोरी के मामले दोगुने हो गए हैं। जरा सी चोट पर हड्डियां चटकने के भी केस सामने आ रहे हैं।
ऐसे करा सकते जांच
लड़कों में 16 से 18 साल और लड़कियों में 13 से 14 साल तक लंबाई बढ़ती है। यदि इस समय विटामिन डी की कमी होती है तो बच्चों की हड्डियां की मजबूती, लंबाई पर असर पड़ता है। इसलिए समय रहते इलाज कराने से बच्चों को भविष्य में होने वाली दिक्कतों से बचाया जा सकता है। बोन मिनरल डेंसिटी या हाइड्रोक्सी से कैल्शियम की जांच की जाती है। रक्त में विटामिन डी का सामान्य लेवल 50 से 20 नैनोग्राम रहना चाहिए लेकिन 20 नैनोग्राम तक रहे तो सतर्क हो जाएं। इसे धूप, विटामिन डी की गोली या खानपान से बढ़ाया जा सकता है।
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विटामिन डी की कमी के लक्षण
- हड्डी और मांसपेशियों में कमजोरी
- चलते समय घुटने से आवाज आना
- बिना किसी श्रम से पसीना आना
- हड्डियों में दर्द होना
- इम्यूनिटी में कमी से बार-बार बीमार होना
- थकावट महसूस करना
- समय से पहले वृद्ध होना
इनसे विटामीन डी मिलता
सूर्योदय के समय धूप में रहने से विटामिन डी ज्यादा मिलती है। इससे चर्म रोग होने की संभावना कम रहती है। इसके अलावा मछली, अंडे का पीला भाग खाने, गाय का दूध, पनीर, मक्खन, छाछ पीना, गाजर का सेवन करने से भी विटामिन डी मिलता है।
इन्हें नहीं खाएं
फास्ट फूड, वसा युक्त आहार, ज्यादा शक्कर वाले खाद्य पदार्थ, कैफीन विटामिन डी का अवशोषण में अवरोध पैदा करता है। ऐसे में इनसे बचना चाहिए।
विटामिन डी का सबसे अच्छा श्रोत धूप होती है। हालांकि, बच्चों में इंटरनेट, मोबाइल गेस्म का चलन बढ़ा है। एसी में भी अधिकतर बैठने रहने के कारण बच्चे धूप में कम निकलते हैं। इस वजह से उनमें विटामिन डी की कमी हो जाती है। कोविड के चलते तो इसकी कमी और बढ़ी है। शुरूआत में ध्यान न देने पर आगे बच्चों को बहुत समस्या हो जाती है। - डॉ. पारस गुप्ता, हड्डी रोग विभागाध्यक्ष, मेडिकल कॉलेज।
विटामिन डी की कमी का समय से पता लग जाए तो दवाओं से ही इसे दूर किया जा सकता है। इसकी कमी बड़ों से लेकर छोटों तक में पहले से ही थी लेकिन कोरोना काल में बच्चों के घर में ही अधिकतर समय बिताने के कारण यह समस्या और बढ़ गई है। अब बच्चों की हड्डियों की कमजोरी के मामलों की संख्या दोगुनी हो गई हे। - डॉ. अमित सहगल, आचार्य, हड्डी रोग विभाग, मेडिकल कॉलेज।
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