झांसी की धरती से रहा है चंद्रशेखर आजाद गहरा नाता
अमर शहीद क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का बुंदेलखंड और झांसी की धरती से गहरा नाता रहा है। यहां उन्होंने अपने क्रांतिकारी जीवन के छह साल बिताए हैं। यहीं रहकर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ संग्राम का तानाबना बुना था। वे ओरछा के सातार में एक कुटी में नाम बदलकर रहे। इतना ही नहीं उनकी शहादत के बाद मां जगरानी देवी ने भी जीवन के अंतिम क्षण यहां बिताए और यहीं उन्होंने अंतिम सांस ली।
कुटिया में बनाते थे क्रांति की योजनाएं
चंद्रशेखर आजाद ने अज्ञात वास बुंदेलखंड में ही रहकर काटा था। बुंदेलखंड के कई क्षेत्रों में वे नाम बदलकर रहे। ओरछा स्थित सातार में वह एक कुटिया में पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से रहते थे। सातार में उनकी कुटी क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बन गई थी। अधिकांश गुप्त योजनाएं इसी कुटी में बनती थीं। चंद्रशेखर आजाद को बुंदेलखंड का खाना खासकर यहां की कढ़ी बेहद पसंद थी। ओरछा के जंगलों में उन्होंने दूसरे क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण और बच्चों को अध्यापन कराया। इसके साथ ही यहां उन्होंने अपने साथियों के साथ निशानेबाजी भी की।
मां जगरानी देवी का भी यहीं हुआ निधन
चंद्रशेखर आजाद के बलिदान के कुछ समय बाद ही उनके पिता शिवराम तिवारी की भी मौत हो गई थी। ऐसी परिस्थितियों में उनकी मां जगरानी देवी अकेली पड़ गईं। झाबुआ जिले के भाबरा गांव में वह गुमनामी में दिन बिताने लगी थीं। यहां वे लकड़ी और कंडे बेचकर जीवन बिता रही थीं। मां के बारे में जानकारी मिलने पर आजाद के सहयोगी सदाशिव राव मलकापुरकर उन्हें झांसी ले आए। चारों धाम की तीर्थ यात्रा कराई। झांसी में कई साल बिताने के बाद मां जगरानी देवी का 22 मार्च 1951 को निधन हो गया। आज भी उनकी समाधि बड़ागांव गेट स्थित मुक्तिधाम पर बनी हुई है।