झांसी। बुंदेलखंड के 34 पुरा स्मारकों के रखरखाव के लिए शासन ने चालू वित्तीय वर्ष में मात्र डेढ़ लाख रुपये जारी किए हैं। जो इनके संरक्षण के लिए नाकाफी हैं। 11वीं से 19वीं शताब्दी में निर्मित इन स्मारकों के संरक्षण का जिम्मा राज्य पुरातत्व विभाग के पास है।
झांसी, महोबा और ललितपुर जनपद में स्थित इन स्मारकों के लिए यह धनराशि ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। शासन ने पिछले वर्ष भी इसी तरह की राशि जारी की थी। ऐसे में इन स्मारकों का संरक्षण सही तरीके से हो पाना मुमकिन नहीं दिख रहा है।
गौरतलब है कि इतिहास एवं अतीत की सच्चाईयों से रूबरू कराने में पुरा धरोहरों की सदैव ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बुंदेलखंड के कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां तत्कालीन राजवंशों ने भव्य मंदिरों, स्मारकों, मकबरा, दुर्ग, कुंड आदि के निर्माण कराए। यह भवन वक्त के तमाम थपेडे़ खाकर भी खुद के अस्तित्व को बचाए हुए हैं। इन 34 स्मारकों का संरक्षण राज्य पुरातत्व विभाग के जिम्मे है। इनमें से झांसी में तीन, महोबा में पांच एवं ललितपुर में 26 स्मारक स्थित हैं।
लेकिन इनकी मरम्मत, रखरखाव व सौंदर्यीकरण के लिए कभी विशेष कदम नहीं उठाए गए। इसका उदाहरण चालू वित्त वर्ष में शासन द्वारा जारी किए गए डेढ़ लाख रुपये हैं। इस धनराशि से इन स्मारकों का समुचित रखरखाव करना मुश्किल है।
विभागीय सूत्रों के अनुसार बुंदेलखंड के इन स्मारकों के लिए सदैव ही इसी प्रकार की धनराशि आवंटित होती रही है। वित्तीय वर्ष 2010-11 में एक लाख रुपये, वर्ष 2011-12 में एक लाख 75 हजार रुपये, वर्ष 2012-13 में दो लाख रुपये, 2013 - 14 में एक लाख 50 हजार रुपये एवं वर्ष 2014 -15 में एक लाख 50 हजार रुपये क्षेत्रीय इकाई को आंवटित हुए।
हालांकि केंद्र की ओर से जरूर 12वें वित्त आयोग से 50 लाख, 13वें वित्त आयोग में दो करोड़ रुपये की धनराशि प्राप्त हुई। सूत्रों के अनुसार संसाधनों, कर्मचारियों एवं धन आदि के अभाव में स्मारकों के सौंदर्यीकरण, साफ सफाई की व्यवस्था नहीं हो पाती है, वहीं प्रचार-प्रसार भी संभव नहीं हो पाता है।
संरक्षण में हैं यह स्मारक
राज्य पुरातत्व विभाग के संरक्षण में कई ऐतिहासिक स्मारक, मंदिर व धरोहरें हैं। जो 11 वीं शताब्दी से लेकर 19 शताब्दी तक के दौर में निर्मित हुए है। इनमें झांसी में लक्ष्मी मंदिर, रघुनाथ राव मंदिर - हाथी खाना, बरुआसागर का किला, ललितपुर में जखौरा का राम मंदिर, उल्दनाकलां का शिव मंदिर, सौजना का जैन मंदिर, भदौरा का दिगंबर जैन मंदिर, बार का नवग्रह मंदिर, सीरोन खुर्द का मंदिर, पिपरई का लक्ष्मण गढ़ मंदिर, मादौन का सुमेर गढ़ मंदिर, भौंता का मंदिर,
धौजरी का रणछौर मंदिर, लागौन का मंदिर तथा कुंड, बालाबेहट का किला, हटवारा मंदिर, सतगता की प्रस्तर बावली, गिरार का राम मंदिर, ककरूआ का प्राचीन मंदिर, सीरोन का मंदिर, सौरई का किला, दो गौंडवानी मंदिर, गुगरवारा का शिव मंदिर, टोड़ी का मंदिर, बार का प्राचीन मकबरा, पिपरई का दो गोंडवानी मंदिर, बिजरौठा की प्राचीन बैठक, धनगोल का दुर्गा जी का मंदिर, बरीखुर्द का राघवेंद्र सरकार मंदिर, महोबा में भरवारा का शांतिनाथ मंदिर, चरखारी का ड्योढ़ी दरवाजा, इमिलिया डांग का प्राचीन मंदिर, बम्हौरी बेलदारन का योगिनी माता मंदिर, सूपा का गढ़ी शामिल हैं।
सफाई कर्मी न होने से कचरे के ढेर बन रहे स्मारक
बुंदेलखंड के ऐतिहासिक 34 स्मारकों की सुरक्षा की स्थिति दयनीय है। मात्र 3 स्मारकों में ही सुरक्षा कर्मी हैं, जो नगर के लक्ष्मी मंदिर, बरुआसागर का किला तथा बालाबेहट में तैनात हैं। जबकि, एक भी सफाई कर्मचारी नहीं है। इस कारण कई स्मारक कचरे के ढेर में परिवर्तित हो रहे हैं।
विभागीय अधिकारियों के अनुसार नगर निगम, नगर पालिकाओं, नगर पंचायतों को समय-समय पर कई बार पत्र लिखा जाता रहा है, लेकिन कभी सफाई कर्मचारी नहीं भेजे जाते हैं।
सीमित संसाधनों में स्मारकों के रखरखाव का प्रयास किया जा रहा है, साथ ही पर्यटन विभाग व वित्त आयोग से धनराशि प्राप्त कर स्मारकों का विकास कराया जा रहा है।
- डॉ. एसके दुबे, क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी