झांसी। ‘पढ़ने की कोई उम्र नहीं’, ‘पढ़ने में कोई शर्म नहीं’ शिक्षा की अलख जलाने वाले ये स्लोगन बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में साकार होते लगते हैं। विश्वविद्यालय के पत्रकारिता संस्थान में एक पिता-पुत्र साथ-साथ एक ही कक्षा में अध्ययनरत हैं, जबकि बेटी इसी विश्वविद्यालय में एलएलबी की छात्रा है।
पोस्टमास्टर के पद से रिटायर हुए सिमथरी चिरगांव के वासुदेव शरण दुबे ने दोबारा पढ़ाई शुरू की है। बकौल वासुदेव, वह उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे लेकिन इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद ही उन्हें नौकरी लग गई। नौकरी में रहते हुए उच्च शिक्षा पाने का सपना साकार नहीं हो पाया तो रिटायर होने के बाद इसे पूरा करने की ठानी। इस वर्ष बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के पत्रकारिता संस्थान में बीए (जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन) में दाखिला लिया।
वासुदेव कहते हैं कि उनके बेट श्लोक दुबे भी इंटरमीडिएट पास करने के बाद इसी कक्षा में हैं। पढ़ाई के दौरान क्लास में मेरी उससे आपस में बातचीत नहीं होती है। घर पर मैं जरूर उसकी पढ़ाई में मदद करता हूं। मेरी बेटी रिचा भी विश्वविद्यालय के जगजीवन राम विधि संस्थान में एलएलबी की छात्रा हैं।
‘मेरे पिता मेरे सहपाठी भी हैं। उन्होंने लंबे अरसे बाद एक बार फिर से अपना छात्र जीवन शुरू किया है। उनका यह कदम समाज के तमाम लोगों के लिए प्रेरणादायक है। यह बात और है कि मैं पिता के साथ क्लास में असहज महसूस करता हूं।’
- श्लोक दुबे
‘पिता - पुत्र को एक साथ एक ही कक्षा में पढ़ाना, मेरे अध्यापन कॅरियर का अनूठा अनुभव है। यह समाज के लिए भी अच्छा संदेश हैं। लोगों को इस परिवार से प्रेरणा लेनी चाहिए।’
- डॉ. सीपी पैन्यूली (अध्यक्ष, पत्रकारिता विभाग)
सीखने की कोई उम्र नहीं
‘ज्ञान किसी भी उम्र में प्राप्त किया जा सकता है। सीखने की कोई उम्र नहीं होती है। रिटायरमेंट के बाद भी यदि किसी में सीखने की ललक है, तो यह सकारात्मक ऊर्जा का ही नतीजा है।’
- सुरेंद्र दुबे (कुलपति, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय)