प्राचीन भारत में प्रमुख जलमार्ग थी बेतवा नदी
झांसी। बुंदेलखंड की बेतवा नदी प्राचीनकाल में आवागमन का प्रमुख साधन रही है। बौद्ध, जैन व हिंदू धर्म के प्रचारक और मौर्य सहित कई राजवंशों के सदस्य इसी जलमार्ग का उपयोग करते थे। पुरातत्व विभाग को इसके कई साक्ष्य मिले हैं। उसे एरच, बंदरगुढ़ा, देवगढ़ व रणछोड़ में बंदरगाह होने के प्रमाण मिले हैं। विभाग एक बार फिर भूवैज्ञानिकों की मदद से जुलाई में सर्वे शुरू कर रहा है।
भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय ने बेतवा में जल मार्ग बनाने का मंजूरी दे दी है। इस जल मार्ग पर जल पोत चलाए जाएंगे। अगर पुरातत्व विभाग की खोजों पर नजर डालें तो बुंदेलखंड में 300 ईसा पूर्व प्राचीन भारत में भी बेतवा नदी देश का प्रमुख जलमार्ग था। पुरातत्व विभाग के अनुसार बेतवा नदी का उल्लेख वैदिक साहित्यों, पुराणों व जातक कथाओं में भी है। मौर्य सम्राट अशोक ने चुनार मिर्जापुर से 42 फुट लंबे भारी भरकम शिला स्तंभ गंगा, यमुना, बेतवा के संपर्क जलमार्ग के जरिये ही सांची तक पहुंचवाए थे। सांची से रणछोड़ व बंदगुढ़ा तक करीब 150 किलो मीटर का जलमार्ग में व्यापक जलभराव है और पत्थर भी नहीं है। ऐसे में नाव आराम से चलती हैं। अभी भी कई क्षेत्रों में नावों से ही आवागमन होता है।
क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. एसके दुबे के अनुसार बेतवा नदी का जलमार्ग सांची, रणछोड़, देवगढ़, बंदरगुढ़ा, एरच, बामौर से होकर हमीरपुर में यमुना से मिलता है। यमुना प्रयाग में गंगा से मिलती है। ऐसे में धर्म प्रचारकों, राजाओं व आम नागरिकों का आवागमन सरलता से होता था। उनके अनुसार जल्द ही भूवैज्ञानिकों के साथ विभाग एक बार फिर सर्वे करेगा। ताकि प्राचीन भारत के इतिहास की नवीनतम जानकारियां प्राप्त हो सके।
महेंद्र व संघमित्रा भी आए थे बेतवा के रास्ते
सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र व पुत्री संघमित्रा ने भी विदिशा सांची पहुंचने के लिए बेतवा नदी जलमार्ग का उपयोग किया था। पुरातत्व अधिकारी के अनुसार उनकी यह यात्रा पाटलिपुत्र से शुरू हुई थी। वह प्रयागराज पहुंचे और यहां गंगा जलमार्ग से हमीरपुर में यमुना जलमार्ग तक और वहां से बेतवा नदी के जलमार्ग का उपयोग कर सांची पहुंचे। इसके अलावा कई बौद्ध भिक्षु भी बेतवा नदी के जलमार्ग का उपयोग व्यापक रूप से करते थे। देवगढ़ में प्राप्त बौद्ध गुफाओं में वह आते जाते थे।
बंदरगाह के साक्ष्य में मिले चट्टान काटकर बने घाट
पुरातत्व विभाग की महत्वपूर्ण खोजों में बुंदेलखंड में बंदरगाह के साक्ष्य मिलना भी शामिल है। एरच, बंदरगुढ़ा, रणछोड़ और देवगढ़ से बह रही बेतवा नदी के तट पर चट्टानों व पत्थरों को समतल काटकर उनके घाट मिलना है। इन स्थलों पर जलभराव भी व्यापक होता है। लगभग 10 से 12 सीटर वाली नावों का उपयोग इस जलमार्ग से होता था। जातक कथाओं में पठारी नदियों को अगम्या कहा गया हैं। इनमें बेतवा भी है। ऐसे में यह विशाल नाव नहीं चल पाते होंगे।
480 किलोमीटर बहती है बेतवा
लगभग 480 किलोमीटर बहने वाली बेतवा नदी के तट पर कई महत्वपूर्ण प्राचीन सांस्कृतिक नगर बसे हैं। इनमें विदिशा, सांची, देवगढ़, ओरछा, एरच आदि हैं। मध्य प्रदेश के भोजपुर भोपाल से निकलकर यह नदी विदिशा, ललितपुर, झांसी होती हुई हमीरपुर में यमुना से मिल जाती है।