उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के बीच बेतवा नदी के जल बंटवारे को लेकर बना बेतवा रिवर बोर्ड को भंग किए जाने की तैयारी है। केंद्र सरकार ने दोनों राज्यों से सहमति मांगी है। इस संबंध में 15 अक्तूबर को उच्चस्तरीय बैठक बुलाई गई है। संभावना जताई जा रही कि बोर्ड के भंग हो जाने के बाद राजघाट बांध का संचालन किसी एक राज्य को सौंप दिया जाएगा। हालांकि ऐसे में जल बंटवारे को लेकर दोनों राज्यों के बीच विवाद की भी आशंका रहेगी।
बेतवा नदी के जल बंटवारे के लिए 1976 में संसद से पारित अधिनियम के जरिये इस बोर्ड का गठन हुआ। बोर्ड में केंद्र सरकार के साथ दोनों प्रदेशों के प्रतिनिधि शामिल किए गए। वर्ष 1979 में राजघाट बांध परियोजना एवं विद्युत गृह निर्माण कार्य आरंभ हुआ। परियोजना लागत एवं लाभ में दोनों राज्यों की हिस्सेदारी बराबर तय हुई। वर्ष 2000 में बांध पहली दफा भरा गया। बांध के रखरखाव पर सालाना करीब 40-45 करोड़ खर्च होते हैं लेकिन 2020 से मध्य प्रदेश ने हाथ खींचना शुरू कर दिया। इस वजह से मध्य प्रदेश की भारी देनदारी हो गई। दोनों प्रदेशों में टकराव शुरू हो गया। मध्य प्रदेश की ओर से हिस्सेदारी न देने की शिकायत केंद्रीय जल आयोग में हुई। इसके बावजूद मध्य प्रदेश देनदारी चुकाने पर राजी नहीं हुआ।
उधर, इन सबके बीच बेतवा रिवर बोर्ड को भंग किए जाने की तैयारी शुरू कर दी। इस संबंध में केंद्र सरकार के जल संसाधन मंत्रालय की ओर से उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के सिंचाई अफसरों को पत्र भेजा गया। इसमें सहमति मांगी गई है। मुख्य अभियंता (परियोजना) एवं रिवर बोर्ड सदस्य राजेश मिश्रा का कहना है कि पत्राचार किया जा रहा है। 15 अक्तूबर को होने वाली बैठक में आगे फैसला होगा।