फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बेरा मशीन खराब, ईएनटी विभाग ‘बहरा’

Wed, 14 Dec 2016 12:28 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
विज्ञापन
bera, medical college - फोटो : demo
विज्ञापन
महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में सुनने की क्षमता परखने वाली बेरा (ब्रेन स्टेम एवोक्ड रिस्पांस ऑडियोमेट्री) मशीन महीनों से खराब है। इसको लेकर ईएनटी विभाग ‘बहरा’ बना हुआ है। मेडिकल कॉलेज के पास पर्याप्त बजट होने के बावजूद विभाग इसे सुधरवाने में रुचि नहीं ले रहा है। इससे मरीजों को मजबूरन निजी अस्पतालों में जाना पड़ रहा है।
विज्ञापन

ईएनटी विभाग की बेरा मशीन को खराब हुए पांच महीने से अधिक हो चुके हैं। शासन ने मेडिकल कॉलेज में उपकरणों के सुधार के लिए दो महीने पहले एक करोड़ रुपये दिए थे। इसके बाद प्राचार्य ने सभी विभागों को पत्र लिखकर उनके यहां खराब मशीनों का ब्योरा मांगा। कई विभागों ने इसकी जानकारी दी लेकिन, ईएनटी विभाग लापरवाह बना रहा। बैरा मशीन खराब होने की जानकारी मिलने पर प्राचार्य ने कई बार विभाग से डिमांड भेजने के निर्देश दिए। विभाग की उदासीनता का आलम यह है कि अब तक मशीन सुधारी नहीं जा सकी है, जबकि कई अन्य विभागों ने अपनी मशीनें सुधरवा ली हैं। इससे मरीजों को बहुत परेशानी हो रही है। प्राइवेट क्लीनिकों पर जाकर वह जांच कराने को मजबूर हैं। मेडिकल कॉलेज में एक ओर जहां प्रधानमंत्री की पहल पर सुपरस्पेशियलिटी ब्लॉक और मुख्यमंत्री की पहल पर करोड़ों रुपये खर्च कर पांच सौ बेड का वार्ड बन रहा है, दूसरी ओर मरीज बजट होने के बावजूद जांचों के लिए निजी क्लीनिकों का रुख कर रहे हैं। इससे जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने की शासन की मंशा को पलीता लग रहा है। 

विकलांग प्रमाण पत्र बनने में आ रही अड़चन 
बेरा मशीन से कान के मरीजों की सुनने की क्षमता का पता लगाया जाता है। जिला अस्पताल में विकलांग प्रमाणपत्र बनवाने आने वाले कान के मरीजों को भी जांच के लिए मेडिकल कॉलेज रेफर किया जाता है। ऐसे में महीनों से मशीन खराब होने से विकलांग प्रमाण पत्र बनने में अड़चन आ रही है। निजी चिकित्सालयों की जांच के आधार पर दिव्यांग प्रमाण पत्र नहीं बनता है। ऐसे में दिव्यांगों को शासन की योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। 
विज्ञापन


पांच सौ रुपये तक होती वसूली
मेडिकल कॉलेज में बेरा मशीन खराब होने से मरीज निजी चिकित्सालयों में जाकर जेब ढीली करने को मजबूर हैं। निजी अस्पताल भी मनमाने ढंग से पैसा वसूलते हैं। एक बार जांच कराने में मरीज से पांच सौ रुपये तक फीस ली जाती है। 

कॉलेज के पास पर्याप्त बजट
कॉलेज के पास मशीनों के सुधार के लिए शासन की ओर से भेजा गया पर्याप्त बजट उपलब्ध है। जिन विभागों ने अपना मांग पत्र भेजा है, उनकी मशीनें सही हो गई हैं। अभी भी जो विभाग मांग करेंगे उनकी मशीनें ठीक करवा दी जाएंगी। 
विज्ञापन

- डॉ. एनएस सेंगर, प्राचार्य 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें