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मानो या न मानो, ऑक्सीजन की कमी से झांसी में भी खूब टूटी सांसों की डोर

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झांसी। कोरोना की दूसरी लहर पीक पर पहुंची तो झांसी में भी ऑक्सीजन का जबरदस्त टोटा हो गया। हाल ये रहा कि ऑक्सीजन न मिल पाने के कारण कई लोगों की नर्सिंगहोमों में बेड पर पड़े-पड़े सांसें थम गईं। कई अस्पताल में भर्ती नहीं हो पाए, इस कारण उनकी मौत हो गई।
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ऑक्सीजन की कमी से एक भी मौत न होने के केंद्र सरकार के दावों पर विपक्ष ने हमलावर रुख अख्तियार कर लिया है। इसी बीच, अमर उजाला ने झांसी में ऑक्सीजन की कमी से हुई दिक्कतों की पड़ताल की तो पता चला कि जिले में भी कई मरीजों की जान ऑक्सीजन न मिल पाने से चली गई। इनमें दूसरे जनपदों से भी इलाज के भरोसे झांसी आने वाले कई मरीज ऑक्सीजन के टोटे से काल के काल के गाल में समा गए। दर्जनों मरीजों के परिजन दिन-रात ऑक्सीजन की जुगत में इधर-उधर भागते रहे। हाल ये रहा कि कइयों ने अपने मरीज को प्राण वायु देने के लिए औद्योगिक इस्तेमाल में आने वाली ऑक्सीजन भी ऊंचे दाम देकर खरीदी। कुछ लोग अपने मरीजों को ग्वालियर, दिल्ली, आगरा, कानपुर समेत दूसरे महानगर लेकर भागे। हाल ये रहा कि ऑक्सीजन सिलिंडर तक कई गुना महंगे दामों पर बिके।
खपत थी 20 मीट्रिक टन की लेकिन मिल पाई कम
अप्रैल में कोरोना संक्रमण जब अपने पीक पर पहुंच गया था, तब जिले में एक दिन में ऑक्सीजन की खपत 20 मीट्रिक टन तक पहुंच गई थी। हालांकि, मेडिकल कॉलेज में लिक्विड ऑक्सीजन प्लांट होने वहां दिक्कत नहीं हुई लेकिन निजी अस्पतालों में कमी हो गई। क्योंकि, कई दिन 20 मीट्रिक टन से कम ऑक्सीजन आ पाई। हालांकि, सरकार की तरफ से ऑक्सीजन एक्सप्रेस चलने के बाद कुछ दिनों में समस्या दूर हो गई।
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केस-3
टीकमगढ़ के पलैरा निवासी हिदायत (36) की भी ऑक्सीजन की कमी से जान चली गई। बड़े भाई इकबाल खान ने बताया कि 20 अप्रैल को खांसी, बुखार आने पर हिदायत को नौगांव में डॉक्टर को दिखाया था। डॉक्टर ने बुखार, खांसी की दवा देकर घर भेज दिया। बाद में हालत बिगड़ी तो छतरपुर ले गए। यहां ऑक्सीजन की कमी होने पर एंबुलेंस से झांसी ले आए। यहां पर निजी अस्पताल में भर्ती कराया। सुबह ऑक्सीजन खत्म होने पर 26 अप्रैल को उनका निधन हो गया।
केस-4
मिशन कंपाउंड निवासी मनोज की चाची बरुआसागर में रहती थीं। उन्होंने बताया कि अप्रैल में कोरोना संक्रमित होने के बाद चाची की हालत बिगड़ने लगी। सांस लेने में समस्या होने पर उन्हें निजी अस्पताल लेकर गए। यहां डॉक्टरों ने उन्हें ऑक्सीजन सपोर्ट पर रख दिया। इसी बीच, अस्पताल में ऑक्सीजन का टोटा हो गया। मनोज का आरोप है कि नर्सिंगहोम के एक कर्मचारी ने चाची की ऑक्सीजन हटाकर दूसरे मरीज को लगा दी। कुछ देर बार चाची की मौत हो गई।
मेडिकल कॉलेज में 48 घंटे की ऑक्सीजन हर समय उपलब्ध रही। ऐसे में किसी भी मरीज की जान ऑक्सीजन की कमी से कॉलेज में नहीं गई है। - डॉ. अंशुल जैन, नोडल अधिकारी कोविड, मेडिकल कॉलेज।
जिले के किसी भी निजी अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से कोई भी जान जाने की सूचना नहीं है। निजी अस्पतालों में हर समय ऑक्सीजन रही। - निलय जैन, सचिव एवं प्रदेश उपाध्यक्ष नर्सिंगहोम एसोसिएशन।
19, 20 अप्रैल को छोड़ दें तो जिले में हर समय पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन उपलब्ध रही। नर्सिंगहोमों को झांसी समेत एमपी के प्लांट से दिन-रात ऑक्सीजन उपलब्ध कराई गई। - उमेश भारती, औषधि निरीक्षक।
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