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अस्तित्व खो चुकी है आठवीं गढ़ी कारी

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अस्तित्व खो चुकी है आठवीं गढ़ी कारी
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झांसी । बुंदेलखंड की अष्ठगढ़ियों में कारी (कर्री) की गढ़ी अब अपना अस्तित्व खो चुकी है। सात गढ़ी अभी भी अस्तित्व में हैं, जबकि आठवीं आखिरी गढ़ी ध्वस्त होकर पूरी तरह टीले में तब्दील हो गई है, इसका अस्तित्व सिर्फ इतिहास के पन्नों में रह गया है। इस गढ़ी के जागीरदार हरदौल जी के वंशज फतेह बहादुर सिंह बुंदेला थे। छोटी रियासत होने के साथ ही फतेह बहादुर सिंह निसंतान थे। उनकी मृत्यु के पश्चात अंग्रेजों ने इस गढ़ी को अलग से जागीर की मान्यता नहीं दी तथा इस गढ़ी के अंतर्गत आने वाले गांवों को समीपवर्ती टोड़ीफतेहपुर, बिजना और ढुरवई जागीरों में विलय कर दिया।
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इतिहासकार प्रोफेसर डा. अजय सिंह बताते हैं कि पथराई नदी के तट पर बनी इस गढ़ी का वैभव किसी जमाने में देखते ही बनता था। नदी के तट पर सुरम्य वनांचली के बीच बनी यह गढ़ाी बुंदेला शासकों के स्वर्णिम काल का प्रतीक थी। पर, वक्त ने कुछ ऐसा खेल खेला कि इसका कोई देखरेख करने वाला भी नहीं बचा। निसंतान हुए फतेह सिंह बुंदेला की मृत्यु के बाद इस गढ़ी के राजस्व गांवों का तो दूसरी जागीरों में विलय कर दिया पर इस गढ़ी की देखरेख का जिम्मा किसी ने नहीं लिया। कालांतर में धीरे- धीरे स्थापत्य कला से समृद्ध इस गढ़ी की इमारत खंडहर में तब्दील हो गई, अब झाड़ियों के बीच टीलों पर इसके मामूली अवशेष दिखाई देते हैं। हालांकि नई पीढ़ी इस गढ़ी से पूरी तरह अनजान है। पर्यटन गाइ़ड इंदर सिंह बुंदेला का कहना है कि जिस स्थान पर बुंदेला जागीरदारों की कारी ( कर्री ) की गढ़ी थी,उस स्थान को ही संरक्षित कर दिया जाए तो मुगलों और अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाले दीमान हरदौल के वंशजों की बुंदेलखंड की अष्ठ गढ़ियों का इतिहास आने वाली पीढ़ी भी जान सकेगी। अन्यथा सात गढ़ी तक तो लोगों को इसके प्रमाण मिलेंगे पर आठवीं गढ़ी पूरी तरह विलुप्त हो जाएगी। आज भी कारी (कर्री) और आसपास के गांवों के लोग इस गढ़ी के इतिहास से अनजान है, उन्हें यह भी पता नहीं है कि कभी यहां कोई गढ़ी भी थी। कारी जो कालांतर में कर्री जागीर बन गई इसके अंतर्गत रजवारा, सिजारा, सुजवां, सेमरी कत्यान, सेमरी अहिरान आते थे, पर जागीरदार फतेह सिंह बुंदेला के निसंतान मृत्यु हो जाने पर इन गांवों को दूसरी रियासतों में विलय कर दिया गया।
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