लोककवि ईसुरी की श्रृंगार की चौकड़ियों में उनकी नायिका का नाम रजऊ लिखा गया है, आखिर रजऊ थी कौन? जब हमने इस बारे में ग्राम मेंढ़की के निवासी बुजुर्ग अशोक कुमार पाठक से पूंछा तो उन्होंने हंसते हुए बताया कि गांव के पूर्वज इसका एक किस्सा बताते थे कि युवा अवस्था में ईसुरी कुछ दिनों के लिए धौर्रा गांव में व्यवसाय के सिलसिले में रहने लगे थे, यहीं पर उनकी नजदीकी गांव के जमींदार की बेटी रजऊ राजे से हो गई।
जब इसकी भनक जमीदार को लगी तो वह मन में गांठ बांध गया। इसी दौरान उसके घर में चोरी हो गई तथा उसकी नौकरानी से जेवरात भी बरामद हो गए। जमींदार ने नौकरानी से कहा कि अगर वह कह दे कि चोरी ईसुरी के कहने पर की थी तो उसे दंड नहीं देंगे। नौकरानी ने भरी पंचायत में कह दिया कि ईसुरी के कहने पर ही चोरी की थी, फिर क्या था जमींदार ने ईसुरी को नीम के पेड़ पर लटकाकर पीट दिया।
इसके बाद ईसुरी धौर्रा गांव छोड़कर तो चले आए पर यह घटना और रजऊ दोनों को वे जीवन भर नहीं भूल सके, ईसुरी ने अपने काव्य में इस घटना का जिक्र करते हुए यह चौकड़िया लिखी है, जा भई दशा लगन के मारें रजऊ तुम्हारे द्वारें। जिन तन फूल छड़ी न लागी, तिन तन दईं तरवारें। हम तो टंगे नीम की डारें, रजुआ करें बहारें, ठाड़ी हती टिकी चौखट सें हो गई ओट किबारें।
ईसुरी के काव्य के श्रृंगार में है बुंदेली बोली का लालित्य
मेंढ़की गांव के निवासी प्रदीप तिवारी बताते हैं कि ईसुरी के काव्य में श्रृंगार और वैराग्य के अलावा बुंदेली बोली का लालित्य भी है। उन्होंने श्रृंगार में वैराग्य का सुंदर प्रयोग करते हुए लिखा है, चलती बेर नजर भर हेरो, मन भर जावे मेरो। मिला लेओ आंखन में आंखें घूंघट तनक उघेरो। टप टप अंसुआ गिरत नैन सों चिते चिते मुख तेरो। ईसुर कहत विदा की बेरा होत विधाता डेरो।
श्रृंगार की इस चौकड़िया में ईसुरी ने जीवन के अंतिम क्षणों का भावुक कर देने वाला वर्णन किया है। बुंदेली बोली की आत्मा कहे जाने वाले लोककवि ईसुरी अब इस दुनिया में नहीं हैं, पर उनकी स्मृतियों को सहेजने वाला भी कोई नहीं है। मेढ़की में ईसुरी शोध संस्थान की स्थापना की गई थी, पर सरकारी उपेक्षा के चलते यह बंद पड़ा है। इनकी फागों के प्रकाशन का भी सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किया गया है।