हिंदी जोड़ती है, परिवेश से, समाज से अलग-अलग क्षेत्रों में उनके पूरकों से। अभिनेता को अभिनय से, संवाद को भाव से, विक्रेता को खरीदार से, वकील को मुवक्किल से और डॉक्टर को मरीज से।
हिंदी की बदौलत सफलता और यश की सीढ़ियां चढ़ रहे युवाओं और हिंदी प्रेमियों ने अमर उजाला से हिंदी के बारे में अनुभव साझा किए। साथ ही, व्यवहारिक कारण भी बताए।
सभी ने माना कि हिंदी मात्र भाषा भर नहीं, हर वर्ग की जरूरत और ख्वाहिशों को पूरा करने का माध्यम है। तकनीक, कॉरपोरेट, उद्योग, कला, संस्कृति, रंगमंच, शिक्षा सब इसकी शरण लेते हैं। इसलिए इस पर गर्व करना और सम्मान देना सभी का फर्ज है।
हिंदी मुख से निर्मल बहती है, अंग्रेजी बहुत अटकाती है: डॉ. हिमांशु द्विवेदी
बुंदेलखंड नाट्य कला केंद्र के संस्थापक रंगकर्मी डॉ. हिमांशु द्विवेदी का कहना है कि बच्चा जब जन्म लेता है तो वह अपने परिवेश के कारण मातृभाषा में ही सीखने की शुरुआत करता है।
उसका बौद्धिक विकास होता है। इस दौरान वह जिस भाषा को ग्रहण करता है वह उसके लिए जीवन भर सहज रहती है। हम लोगों की मातृभाषा चूंकि हिंदी है इसलिए हमारी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम यही है।
आज हो यह रहा है कि बच्चा पलता, बढ़ता तो हिंदी के पिरवेश में है, लेकिन उस पर अंग्रेजी माध्यम थोप दिया जाता है। आपने देखा होगा अंग्रेजी बोलते वक्त लोग अधिकतर अटकते हैं... आई थिंक...आई थिंक, यू नो.., यू नो.. दरअसल यह भाषा में असहजता की वजह से होता है।
क्योंकि कुछ बोलने से पहले सोचना पड़ता है। हिंदी में यह बहुत सहज भाव से होता है। लेकिन अंग्रेजी बोलते वक्त मूल रूप से व्यक्ति हिंदी भाषी पहले सोचता है फिर दिमाग में उसका अंग्रेजी में अनुवाद करता है और इसके बाद अभिव्यक्त करता है।
इस प्रक्रिया में समय लगता है इसी वजह से संकोच, हिचकिचाहट या अड़चन होती है। इसके विपरीत हिंदी में बोलते वक्त सहजता, आत्मविश्वास झलकता है। यही हम रंगकर्मियों की ताकत है कि संवाद और भाव अंदर से आते हैं।