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डॉक्टरी हो या इंजीनियरिंग, चलाएं तोप या बम, हिंदी में ही ‘महकेंगे और गरजेंगे’ हम

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amar ujala hindi hai hum
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झांसी। हिंदी को सम्मान दिलाने के लिए छोटे-छोटे कदम बड़ा बदलाव लाएंगे। झांसी के हिंदी सेवक वर्षों से ऐसा कर भी रहे हैं। उनके प्रयासों ने लोगों को प्रेरणा भी दी है। अमर उजाला की ‘हिंदी हैं हम’ मुहिम के तहत हिंदी सेवकों की तमाम भूमिकाएं सामने आ रही हैं। कुछ उल्लेखनीय कदम उठा चुके हैं कई युवा भविष्य में अपने-अपने क्षेत्र मे हिंदी जगत के लिए कुछ करने का जज्बा रखते हैं। कोई चिकित्सा जगत में, कोई सेना में रहकर हिंदी को बढ़ावा देना चाहता है कोई स्तरीय लेखन की वकालत कर, कदम से कदम मिलेंगे मंजिल जरूर हासिल होगी। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित डॉ.आरएन शर्मा साहित्य लेखन के लिए तो जाने ही जाते हैं उन्होंने पद पर रहते पोस्टर्माटम और इंजरी रिपोर्ट हिंदी में लिखने का चलन शुरू किया था। धन्य हैं ऐसे हिंदी सेवी।
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मैंने तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट, इंजरी रिपोर्ट लिखना हिंदी में शुरू कराया था: डॉ.राम नारायण शर्मा
झांसी के रहने वाले सेवानिवृत्त चिकित्सक डॉ.राम नारायण शर्मा ने बताया कि वे पेशे से डॉक्टर और शुरू से ही हिंदी सेवक रहे। व्यक्तिगत स्तर पर भी और पद पर रहते हुए भी उन्होंने जहां तक संभव हुआ हिंदी को प्रोत्साहित किया। डॉ. शर्मा ने बताया कि जिला अस्पताल में सिविल सर्जन रहते हुए उन्होंने अपने कार्यकाल में डॉक्टरों व अन्य स्टाफ को छुट्टी का आवेदन व अन्य लिखा पढ़ी हमेशा हिंदी में करने को प्रेरित किया। उस दौरान लोगों ने इसे माना भी और बाद में सराहा। अन्य डॉक्टरों ने हिंदी सही ढंग से लिखना सिखाने के लिए आभार भी जताया। डॉ. शर्मा के अनुसार उन्हाेंने लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस, एमएस की डिग्री ली थी। उन्हें लगा कि कार्यक्षेत्र में हिंदी को बढ़ावा देना चाहिए। इसलिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट, इंजरी रिपोर्ट हिंदी में बनाना शुरू किया। हाईकोर्ट ने उनके इस प्रयास की विशेष रूप से सराहना की। उनके अनुसार व्यक्ति अगर ठान ले तो वह कुछ भी कर सकता है। वे अब तक 28 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि हिंदी के साथ बुंदेली व अन्य आंचलिक भाषाओं को भी सम्मान देने की जरूरत है।
डॉक्टर पर्चे पर मरीजों को परहेज, सुझाव हिंदी में लिखें तो अच्छा रहेगा: निमिष जैन
महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस तृतीय वर्ष के विद्यार्थी निमिष जैन भी हिंदी से खास लगाव रखते हैं। उन्होंने कहा कि समाज में अंग्रेजी आती है तो हर तरह की सफलता मिल जाएगी ऐसी एक मानसिकता बन गई है। इससे हिंदी पिछड़ती जा रही है। सभी को आगे आकर हिंदी को बढ़ावा देने के लिए प्रयास करने होंगे। प्रतिष्ठित पदों पर बैठे लोग जब हिंदी को सम्मान देंगे तो उसे उचित स्थान मिलेगा। मिसाल के तौर पर अगर डॉक्टर मरीज को पर्चे पर परहेज, व्यायाम व अन्य सुझाव हिंदी में लिखना शुरू करेंगे तो एक तो हर तबके का मरीज आसानी से समझ सकेगा दूसरा उसे लगेगा कि शहर के बड़े डॉक्टर जब हिंदी को महत्व देते हैं तो आम आदमी क्यों नहीं देता। मैं जब पढ़ाई पूरी कर डॉक्टर बन जाऊंगा तो हिंदी को बढ़ावा देने का हर संभव प्रयास करूंगा। हर क्षेत्र के लोगों को ऐसा ही करना चाहिए।
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सेना में अफसर बन देश और हिंदी की सेवा करती रहूंगी: रिया वर्मा
बिपिन बिहारी कॉलेज की बीएससी द्वितीय वर्ष की छात्रा रिया वर्मा के अनुसार हिंदी देश के गर्व करने वाली भाषा है। आखिर कोई एक भाषा तो राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोती है। वो हिंदी है, वर्तमान में उसे उसका पूरा सम्मान नहीं मिल पा रहा है। इस ओर सभी को गंभीरता से विचार करना होगा। हिंदी को लेकर सरकारी बैठकें हों या नेताओं के भाषण सब हवा हवाई अधिक साबित हो रहे हैं। इसलिए जमीन पर काम करने की जरूरत है। इसमें असंभव जैसा कुछ भी नहीं है। जर्मनी, रूस, चीन व अन्य कई देशों में वहां की मातृभाषा ही सर्वोपरि है। क्या वे नहीं जानते अंग्रेजी के बढ़ते महत्व के बारे में। लेकिन वे मातृभाषा से प्रेम के नाम पर दिखावा नहीं करते। हमें भी प्रेम करना होगा। मैं सेना में महिला अफसर बनना चाहती हूं। अगर यह संभव हुआ तो वहां भी हिंदी के सम्मान के लिए लगातार काम करूंगी।
हिंदी में बदलती जीवन शैली के हिसाब से शोध और लेखन हो: जय सिंह
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंपर्क विभाग में सहायक प्रोफेसर जय सिंह के अनुसार हिंदी में शोध, साहित्य में उत्कृष्ट कार्य की जरूरत है। शोध से तात्पर्य हिंदी विषय भर के शोध से नहीं, अन्य विषय के शोध भी हैं। संस्कृत में उच्च कोटि की साहित्य व शोध परक रचनाएं हुईं। यही कारण है कि आज भी संदर्भों में उन पुस्तकों व पन्नों को पढ़ा, समझा जाता है और उनका हवाला दिया जाता है। जबकि हिंदी में स्तरीय लेखन दिन पर दिन कम हो रहा है। मौलिक काम होगा तो हिंदी का रुतबा और बढ़ेगा। अनुवाद में वो बात नहीं रहती। जीवन शैली तेज हुई है इसके हिसाब से अगर हिंदी में अच्छा लिखा-पढ़ा जाएगा तो हिंदी को उचित सम्मान मिलेगा। बाजार अपने मुनाफे का गणित समझ चुका है। अपने हितों के लिए हिंदी का उपयोग कर रहा है। अब जिम्मेदारी समाज और हर व्यक्ति की है।

आरएन शर्मा। - फोटो : DEHAT

निमिष जैन। - फोटो : DEHAT

रिया वर्मा। - फोटो : DEHAT

जय सिंह। - फोटो : DEHAT

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