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किसमें है दम जो रोकेगा आपको सफलता की सीढ़ियां चढ़ने से, आगे बढ़ें, गर्व से कहें ‘हिंदी हैं हम’

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amar ujala hindi hai hum
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झांसी। देख रहे हैं न आप अपनी झांसी, ललितपुर के कितने होनहार हिंदी पर गर्व कर अपना, अपने क्षेत्र का मान बढ़ा रहे हैं। ऐसा नहीं कि ये सभी हिंदी के शिक्षक या लेखक ही हैं। अरे, हिंदी किसकी जरूरत नहीं है। सादगी और संस्कार भरी शिक्षा से लेकर चकाचौंध वाली फिल्मी दुनिया तक हर जगह बोलबाला है। अमर उजाला ‘हिंदी हैं हम’ मुहिम के तहत मातृभाषा के सम्मान से जुड़ी हर छोटी, बड़ी बात को आप तक पहुंचाता रहेगा। क्षेत्र के हिंदी प्रेमियों ने एक बार फिर अपने संघर्ष और सफलता के रोचक किस्से सुनाए। बताया कैसे उन्होंने हिंदी की बदौलत हालात को अपने पक्ष में कर लिया। तहेदिल से अपील की कि हम सभी हिंदी पर गर्व जरूर करें।
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मॉडलिंग से फिल्मों तक हिंदी मेरी किस्मत के रास्ते खोलती गई: अवंतिका खत्री
मूल रूप से झांसी की रहने वाली अवंतिका खत्री अभिनेत्री और फिल्म निर्देशक हैं। उन्होंने बताया अपने हस्ताक्षर का पहला अक्षर ही हिंदी में बनाया है। वे बेशक अंग्रेजी माध्यम स्कूल से पढ़ी हैं लेकिन उनकी पहली पसंद हिंदी है। परिवेश के कारण बिना किसी खास प्रयास के हिंदी उनके जीवन में रच बस गई। कब वह उनके लिए एक संपत्ति बन गई उन्हें पता ही नहीं चला। उन्होंने बताया कि इंदौर में प्रबंधन की उच्च शिक्षा ली। लेकिन मन तो अभिनय में रमा था। इसलिए उन्होंने मायानगरी का रुख किया। फिर क्या था कुछ कर दिखाने का जज्बा और हिंदी का साथ किस्मत के ताले खुलते गए। शुरुआत में उन्हें मॉडलिंग और विज्ञापनों में काम मिला। फिर उन्हें हिंदी फिल्म वार छोड़ न यार में अभिनय का मौका मिला। इस फिल्म ने उनका उत्साह और बढ़ाया। उन्हें खुद यकीन नहीं हो रहा था कि हिंदी की बदौलत उन्हें फिल्म में काम मिला। और कैसे दर्शकों के माध्यम से देश के कोने-कोने तक उनकी पहुंच हो गई। इसके बाद उन्हें ‘कुछ कुछ लोचा है’ फिल्म में भी अभिनय का मौका मिला। फिर उन्होंने सामाजिक मुद्दों पर आधारित लघु फिल्मों का निर्देशन भी किया। अवंतिका का कहना है कि उनकी तरह झांसी के अन्य युवा भी हिंदी और अपने आत्मविश्वास के साथ सफलता की सीढ़ियां चढ़ सकते हैं।
हम भी बुंदेले हैं, अंग्रेजी नहीं आती तो क्या हिंदी को ताकत बनाया: राम बुंदेला
मूल रूप से ललिपुर के रहने वाले फिल्म निर्देशक राम बुंदेला ने बताया मेरी भी कहानी हिंदी के इर्द गिर्द है। पुलिस में एसपी बनने का सपना था नहीं बन पाया। फिर दूसरा शौक अभिनय का था। लिहाजा मुंबई पहुंच गए। शेखर कपूर जी के पास गए। वो ठहरे अंग्रेजी दां। लेकिन हम भी बुंदेले हैं। उनकी तरह अंग्रेजी नहीं आती तो क्या हमने हिंदी को ऐसी ताकत बनाया कि उनके दिल में जगह बना ली। इस बात का अहसास तब हुआ जब 2018 के खजुराहो फिल्म महोत्सव के दौरान उन्हें सम्मानित करने के लिए आमंत्रित किया। जब वे आए और उन्होंने जब संबोधित किया तो पहली बात हिंदी पर गर्व करने की कही। वर्कशॉप को भी संबोधित करते हुए कहा कि जिस भाषा के हैं उसे जिएं। उसमें ही अभिनय करें। मातृभाषा से बेहतर अभिनय किसी अन्य में किया ही नहीं जा सकता। मैं आभारी हूं हिंदी का जिसने मुझे लगातार मौके दिए। अभिनय का मौका मिला, सोनी टीवी पर कॉलगेट टॉप टेन किया। देवगढ़ जैन मंदिर और वहां की गुफाओं पर डॉक्यूमेंट्री बनाई। वर्तमान में भी बड़े बजट की फिल्म मोहब्बत है क्या चीज का निर्देशन कर रहा हूं। फिलीपींस, थाईलैंड, भोपाल में कुछ शूटिंग हो चुकी है। कोरोना काल में काम रुका हुआ है। हिंदी ने हमें बहुत कुछ दिया। युवा इसका सम्मान करें। उन्हें भी मातृभाषा मुकाम देगी।
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जीवन में कई अंग्रेजी दां को नौकरी के लिए संघर्ष करते, हिंदी वालों को बढ़ते देखा है: डॉ. यूपी सिंह
13 वर्ष से अधिक समय तक बिपिन बिहारी कॉलेज के प्राचार्य और कुछ समय बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति रहे डॉ.यूपी सिंह झांसी और यहां के हिंदी प्रेम को भुला नहीं पाए हैं। उन्होंने बताया कि अन्य भाषा सीखना और जानने में बुराई नहीं है। लेकिन गर्व तो मातृभाषा पर ही होता है। वे खुद हिंदी के साथ ही संस्कृत और अंग्रेजी भी जानते हैं। बताया कि अभिव्यक्ति का सुकून हिंदी में ही मिलता है। जो लोग अंग्रेजी न जानने पर हीन भावना महसूस करते हैं उनसे में यही कहूंगा कि मुझे रिटायर हुए वक्त हो गया। हिंदी की बदौलत मैंने जीवन में लोगों को बुलंदियों तक पहुंचते देखा है। और बहुत अच्छी अंग्रेजी आने के बाद भी लोगों को नौकरी के लिए संघर्ष करते देखा है। अंग्रेजी का विरोधी नहीं हूं, लेकिन देश का स्पंदन हिंदी में है। हिंदी देश की आत्मा है। इसकी अनदेखी राष्ट्र का अनादर है। मैंने हमेशा अपने विद्यार्थियों को हिंदी पर गर्व करने और इसके साथ बढ़ने की शिक्षा दी। आज समाज से भी यही कहूंगा। झांसी हिंदी प्रेमियों और सेवियों की नगरी है।
हम तो हिंदी हैं जी, इसी में जीते हैं इसी में जिएंगे: शिवम यादव
फिल्म प्रोडक्शन से जड़े झांसी निवासी युवा शिवम यादव बताते हैं उन्हें सफलता की पहली सीढ़ी ही हिंदी की वजह से मिली। 2013 में दूरदर्शन के ‘भारत की शान’ कार्यक्रम के लिए उनका चयन निर्णायक के रूप में हुआ। दरअसल, उस आयोजन के लिए निर्णायक मंडल में ऐसे लोग चाहिए थे जिन्हें हिंदी की बेहतर समझ हो और कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिए वे हिंदी में ही प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन भी कर सकें। उस वक्त्त शिवम कविता लिखते थे। इसके बाद हिंदी में थिएटर किया। फिल्म प्रोडक्शन की बारीकियां सीखीं और वर्तमान में झांसी और बुंदेलखंड की लोकेशन पर यही काम संभाल रहे हैं। फिल्म बद्रीनाथ की दुल्हनिया, दिल साला सनकी, जी टीवी के सीरियल डोली अरमानों की, दिल ये जिद्दी है की भी शूटिंग झांसी व आस पास कराई। अनिनेता, अनिभेत्री, निर्देशक कहीं से आएं हम तो हिंदी हैं जी, इसी में जीते हैं। इसी में जिएंगे।

अवंतिका खत्री। - फोटो : DEHAT

शिवम यादव। - फोटो : DEHAT

डॉ. यूपी सिंह। - फोटो : DEHAT

राम बुंदेला। - फोटो : DEHAT

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