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सम्मान, संतुष्टि, उन्नति चाहिए तो हिंदी पर गर्व करना होगा

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amar ujala hindi hai hum
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झांसी। अपनापन तो हिंदी में ही है। फिर हम क्यों उसे बेगाना बना रहे हैं। जो मर्जी आए हम भाषा सीखें, भला कौन मना करता है...। लेकिन अपनी मातृभाषा पर गर्व करना तो बनता है। आइए, जकड़नें तोड़ें नजरिया बदलें। हिंदी ने तो सभी का आदर किया है। साहित्य, संस्कृति से लेकर राजनीतिक, सामाजिक आंदोलनों तक को धार दी है। किताब में ‘अ’ से अनार हो या फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था, हिंदी ने बाहें खोलकर सभी का स्वागत किया है, सभी को बढ़ाया है। फिल्म की दुनिया हो, मनोरंजन या विज्ञापन की हिंदी की सौंधी माटी में सब पनपते गए। अमर उजाला ने हिंदी प्रेमियों और अलग-अलग क्षेत्र में काम कर रहे लोगों से चर्चा की। सभी ने कहा अगर सम्मान, संतुष्टि और उन्नति तीनों चाहिए तो हिंदी पर गर्व करना होगा।
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बॉलीवुड में जब यश, पैसा, पुरस्कार हिंदी देती है, तो गुणगान अंग्रेजी का क्यों: राज शांडिल्य
हम हिंदी में पले बढ़े हैं, हिंदी में विचार करते हैं उसमें ही लिखते हैं, हमें यश, पैसा, पुरस्कार सब हिंदी में मिलते हैं। मुझे बहुत आश्चर्य होता है कि इसके बावजूद हिंदी सिनेमा के छोटे बड़े सभी 90 प्रतिशत सितारे सार्वजनिक आयोजनों, अलग-अलग समारोहों, प्रेस कांफ्रेंस के दौरान अंग्रेजी में ही बात करते हैं। मैं पूछता हूं अगर हमें अंग्रेजी से इतना ही लगाव है तो हम हॉलीवुड का रुख क्यों नहीं करते। वहां अभिनय का शौक भी पूरा होगा और अंगेजी से लगाव भी। सिर्फ बॉलीवुड नहीं, यह ढर्रा लगभग हर पेशे में हो चला है। हम सभी को सोच बदलनी होगी। हर पेशे, हर उम्र और हर वर्ग के लोगों को हिंदी पर गर्व करना होगा। इससे सम्मान भी बढ़ेगा और पहचान भी। टीवी सीरियल और बॉलीवुड फिल्मों के स्क्रिप्ट राइटर और फिल्म ‘ड्रीम गर्ल’ के निर्देशक मूल रूप से झांसी के रहने वाले राज शांडिल्य ने अमर उजाला से कहा कि अमिताभ बच्चन जी, अनु कपूर जी, मनोज बाजपेई जी जैसे कुछ कलाकारों को छोड़ अन्य तो स्क्रिप्ट तक अंग्रेजी में मांगते हैं। शांडिल्य ने कहा उन्होंने इस चुनौती को स्वीकारा है। वे स्क्रिप्ट या तो हिंदी में लिखते हैं या रोमन में। जिसे उनका यह अंदाज और स्क्रिप्ट पसंद आए उसका स्वागत है। इस पहल से नजरिया बदला है। अब कई वेबसाइट खास तौर पर हिंदी स्क्रिप्ट ले रही हैं।
मॉरीशस वाले गर्व करते हैं, हमारी तो मातृभाषा है: पीके अग्रवाल
हिंदी हमारे राष्ट्र का प्रतीक है। उसे सम्मान देना ही चाहिए। बतौर आईएएस अफसर (सेवानिवृत्त) अपने पूरे कार्यकाल में मैंने जो परखा वो यह है कि हिंदी पर हम भारत में भले उतना गर्व न कर रहे हों पर विदेशों में इसका बोलबाला बहुत है। मॉरीशस में 60 प्रतिशत लोग हिंदी बोलते हैं। ट्रिनीडाड, वेस्ट इंडीज में भी हिंदी बोलने, समझने वालों की संख्या पर्याप्त है। हमारे देश में 80 प्रतिशत लोग हिंदी बोल और समझ लेते हैं। फिर इसकी उपेक्षा का कोई कारण ही नहीं है। इस पर जितना गर्व किया जाए कम है। विश्व अर्थव्यवस्था हिंदी में रुचि ले रही है। हिंदी ने योग को दुनिया में पहचान दिलाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। प्रवासी भारतीय भी उच्च स्तरीय हिंदी साहित्य की रचना कर रहे हैं। फिर हिंदी हमारी तो मातृभाषा है।
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हिंदी का रुतबा बढ़ेगा तो बुंदेली की साख खुद बढ़ेगी: सुंदर लिखार
हिंदी का प्रभाव भारत में तो है ही, पूरी दुनिया में है। ये हिंदी की ही ताकत है कि हिंदी सिनेमा का दबदबा विश्व भर में बढ़ता जा रहा है। आज भारत में रिलीज होने वाली फिल्मों को विदेशों में रिलीज होने का इंतजार होता है। यह हिंदी की ही ताकत है। हिंदी और बुंदेली फिल्मों की दुनिया में मुझे अभिनय करने का सौभागय मिला। मेरे लिए तो ये हिंदी किसी वरदान से कम नहीं है। बुंदेली हमारी क्षेत्रीय भाषा है। हिंदी का रुतबा बढ़ेगा तो बुंदेली की साख खुद ब खुद बढ़ेगी। आठ बुंदेली फिल्मों में काम कर चुका हूं। पहचान मिली तो हिंदी फिल्मों में भी अवसर मिला। फरवरी में हिंदी फिल्म अम्मा की बोली रिलीज हुई। जल्द ही हिंदी फिल्म अटकन चटकन आ रही है। इसमें एआर रहमान साहब का संगीत है। गायक सोनू निगम हैं। खुद अमिताभ बच्चन जी ने एक गाना गाया है। ये सब हुआ तो हिंदी की ही बदौलत।
मातृभाषा की जगह कोई अन्य भाषा कैसे ले सकती है: अजय साहू
लोग जरा सा पढ़ लेते हैं और विदेशी भाषाओं पर मुग्ध हो जाते हैं। अरे भला मां का स्थान कोई ले सकता है। फिर मातृभाषा की जगह कोई अन्य भाषा कैसे ले सकती है। रूस, चीन समेत अन्य देश अपनी भाषा से कितना लगाव करते हैं। यह अच्छी बात है। हम सभी को ऐसा ही करना चाहिए। मेरी जो पहचान, सम्मान सबकुछ हिंदी और बुंदेली की वजह से है। मैं इनका ऋण कभी नहीं उतार सकता। खुद को सौभाग्यशाली मानता हूं जो मुझे हिंदी और बुंदेली फिल्मों के निर्देशन और अभिनय का मौका मिला। फिल्म अम्मा की बोली में सह निर्देशक रहा। छह बुंदेली फिल्में भी कर चुका हूं। मेरी तो अपील है हम हिंदी को बढ़ाएं, हिंदी हम सब को बढ़ाएगी।
गैर हिंदी भाषी प्रांत भी हिंदी को महत्व दे रहे: डॉ.संतोष कुमार
भेल में मेरा जब चयन हुआ तो राजभाषा आयोग और हिंदी जगत के शीर्ष लोग चयन बोर्ड में थे। उनका पहला प्रश्न था कि हिंदी को देश भर में कैसे लागू किया जा सकता है। तब मैंने कहा था कि शिक्षा नीति में बदलाव करना होगा। शुरू से ही पढ़ाई हिंदी में कराई जाए। अंग्रेजी एक विषय के रूप में जरूर रहे। वर्षों पहले दिया गया जवाब अब सच होता दिख रहा है। शिक्षा नीति बदली है। चार वर्ष मुझे तमिलनाडु में सेवाएं देने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। मैंने पाया कि तमाम प्रदेशों में आज भी भाषा भले अलग हों पर उनमें संस्कृतनिष्ठ हिंदी के शब्दों का उपयोग पर्याप्त होता है। राजनीतिक कारणों से भले वहां हिंदी का विरोध होता हो पर लोग हिंदी को समझते हैं, बोलने की कोशिश करते हैं उसे महत्व दे रहे हैं। अमर उजाला की पहल सराहनीय है। इस तरह के प्रयास और राजनीतिक इच्छाशक्ति हिंदी को उसका स्थान जरूर दिलाएंगे।
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