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यूपी-एमपी की खींचतान में सालों फंसा रहा केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय

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झांसी। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की खींचतान में केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय सालों फंसा रहा। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता विश्वविद्यालय को छतरपुर ले जाना चाहते थे। एमपी की राज्य सरकार ने भी जमीन देने को तैयार थी लेकिन अंतत: गेंद झांसी के पाले में ही आ गई। यही नहीं, इसे राष्ट्रीय महत्व की संस्था भी घोषित किया गया।
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बुंदेलखंड क्षेत्र में केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय खोलने का विचार पहली बार उस समय आया, जब 27 जुलाई 2009 को जनप्रतिनिधियों के मंडल ने तत्कालीन प्रधानमंत्री से बुंदेलखंड पैकेज की मांग की। साथ ही आईजीएएफआरआई और एनआरसीएएफ का परस्पर विलय करके केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना करने का अनुरोध किया। इसके बाद वर्ष 2010 में झांसी दौरे पर आए तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री से स्थानीय सांसद रहे प्रदीप जैन ने केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय झांसी में ही खोलने की मांग रखी। इस पर उन्होंने सहमति भी जता दी। इसका बिल लोकसभा में पास होने के बाद 28 सितंबर 2012 को राज्यभा में विधेयक प्रस्तुत किया गया। कुछ सदस्यों के विरोध के बाद इसके प्रस्तुतिकरण को स्थगित कर दिया गया।
इसके बाद स्टैंडिंग कमेटी का गठन कर दिया गया। 22 मई 2012 को तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री ने सदन में आश्वासन दिया कि इसे राष्ट्रीय महत्व के एक संस्थान के रूप में स्थापित किया जाएगा। इसके बाद फिर से प्रस्ताव प्रस्तुत हुआ। कृषि और कानून मंत्रालय के पास भी प्रस्ताव भेजा गया। लंबी जद्दोजहद के बाद आदेश जारी हो गया कि रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय का प्रशासनिक मुख्यालय झांसी में होगा। शुरू में झांसी में विश्वविद्यालय के मुख्यालय सहित उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश दोनों में एक-एक कॉलेज खुलेंगे। तत्कालीन प्रधानमंत्री से मांग करने से लेकर तमाम कागजी प्रक्रियाओं, समितियों एवं सदन की बैठकों के बाद पांच साल बीतने के बाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय को हरी झंडी मिल सकी।
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स्टेंडिंग कमेटी की सिफारिश भी नहीं मानी
विश्वविद्यालय की स्थापना को लेकर स्टेंडिंग समिति का गठन किया गया था। तमाम बैठकों के दौर के बाद अंतत: समिति ने यह सिफारिश कर दी कि झांसी के बजाए छतरपुर प्रस्तावित केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के लिए सभी तरह से सर्वाधिक उपयुक्त स्थान है। राज्य सरकार ने भी इसके लिए पहले ही भूमि के तीन बड़े खंड देने का प्रस्ताव किया है। कमेटी की इन सिफारिशों के बाद बड़ा पेंच फंस गया। फिर स्थानीय सांसद प्रदीप जैन ने कृषि मंत्री से बात की। इस पर कृषि मंत्री ने कमेटी की सिफारिशों को एक तरफ करते हुए झांसी में केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय को मंजूरी दे दी।
वर्चुअल शिलान्यास के बाद ऑनलाइन लोकार्पण
2014 में दिल्ली में पूसा कृषि विज्ञान मेले के उद्घाटन समारोह में तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय का वर्चुअल शिलान्यास किया था। ऐसा उत्तर प्रदेश में आचार संहिता लागू होने की वजह से हुआ था। अब कोरोना वायरस के दौर के चलते 29 अगस्त को ऑनलाइन लोकार्पण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करने जा रहे हैं।
लंबे संघर्ष के बाद झांसी को केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय मिला है। इसके मुख्य उद्देश्यों में बुंदेलखंड जैसे पिछड़े क्षेत्र में किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारना तो है ही। साथ ही, बुंदेलखंड क्षेत्र के आर्थिक तौर पर पिछले विद्यार्थियों को स्नातक स्तर पर विशेष छात्रवृत्ति प्रदान करना, स्नातकोत्तर स्तर पर कनिष्ठ अनुसंधान फेलोशिप और पीएचडी स्तर पर वरिष्ठ अनुसंधान फेलोशिप उपलब्ध कराना भी है।
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- प्रदीप जैन आदित्य, पूर्व केंद्रीय मंत्री।
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