झांसी। नाम-पंडित श्याम सुंदर शर्मा, उम्र-70 साल, काम-लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करना। यह पढ़ने में जरा अजीब लगता है कि 70 साल की उम्र में एक बुजुर्ग लावारिस लाशों को गाड़ी में लादकर उनका अंतिम संस्कार करता है। लेकिन यह सच है। शहर के बुुजुर्ग पंडित श्याम सुंदर पिछले 40 वर्षों से लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर रहे हैं। इतना ही नहीं, वह असहायों का भी निशुल्क अंतिम संस्कार कराते हैं। बड़ागांव गेट अंदर रहने वाले पंडित शर्मा का सात भाइयों और 18 भतीजे-भतीजियों का भरा-पूरा परिवार है। शहर के लोग इन्हें बड़े भइया के नाम के बुलाते हैं। वह अब तक दो हजार से अधिक लावारिस और असहायों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं।
बेटी की लाश गोद में उठाये बुजुर्ग की हालत देख पसीज गया था दिल, 40 वर्षों से अंतिम संस्कार कर रहे
झांसी। पंडित श्याम सुंदर बताते हैं कि बात सन 1980 की है। उन्होंने एक ऑटो खरीदा था। एक दिन वह अपने बहनोई भगवान दास शर्मा
जो मेडिकल कॉलेज के रिकॉर्ड सेक्शन में बड़े बाबू थे उनके पास गए। लौटते समय उन्होंने देखा कि वहां एक बुजुर्ग अपनी बेटी की लाश को गोद में लिए रो रहा था। वह बार-बार गाड़ी वालों से बात करता और फिर रोने लगता। उन्होंने उसके रोने का कारण पूछा। पंडित श्याम बताते हैं कि वह बुजुर्ग गिड़गिड़ाने लगा कि बेटी की लाश को अपने घर उरई (जालौन) ले जाना चाहता है, गाड़ी वाले लाश ले जाने के लिए 80 रुपये मांग रहे हैं लेकिन उसके पास सिर्फ 65 रुपये हैं। इतने रुपये में कोई भी लाश ले जाने के लिए तैयार नहीं हो रहा है। पंडित श्याम ने बताया कि उस वक्त उन्होंने अपनी ऑटो से उसे व उसकी बेटी के शव को उरई उसके घर तक छोड़ा था। वहां पहुंचकर वह बुजुर्ग उसकी जेब में रखे 65 रुपये उन्हें देने लगा तो उन्होंने मना कर दिया। यह देख वह बुजुर्ग उनके पैरों में गिर गया। पंडित शर्मा ने बताया कि यहां से वह उरई में रहने वाली अपनी बहन के घर पहुंचे फि र वापस झांसी लौट आए। लेकिन बार-बार उस बुजुर्ग की लाचारी उनकी आंखों के सामने घूमती रही। कुछ समय बाद उन्होंने निर्णय लिया कि वह असहाय और लावारिस लोगों की लाशों का अंतिम संस्कार कराएंगे। उन्होंने एक टैंपो खरीदी और लाश के वास्ते उसका परमिट कराया। तब से लगातार काम जारी है। अब उनके पास कई एंबुलेंस और गाड़ियां हैं। अंतिम संस्कार के लिए पुलिस द्वारा निर्धारित धनराशि दी जाती है, बाकी पैसा वह खुद खर्च करते हैं। उन्होंने बताया कि वह पंडित परिवार से हैं ऐसे में इस काम के लिए कई लोगों ने उन्हें मना किया, समाज और परिवार का वास्ता दिया लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी।
फूलों से सजाते हैं शव, कंधा देकर जलाते हैं चिता
झांसी। पंडित शर्मा बताते हैं कि जिला अस्पताल, मेडिकल कॉलेज या फिर जिले में कहीं भी लावारिस लाश मिलती है तो पुलिस तीन दिन तक लाश रखने के बाद उनका पोस्टमार्टम कर देती है। इसके बाद वह लाशों को फूलमाला से सजाकर उन्हें कंधा देते हैं और फिर गाड़ी से मुक्तिधाम ले जाते हैं वहां मृतक के धर्म के मुताबिक कर्मकांड के साथ उसकी चिता को आग दी जाती है। अगले दिन फूल चुनकर अस्थियां उठाने जाते हैं। मुस्लिम व्यक्ति को दफनाया जाता है। इस दौरान पुलिस भी साथ होती है।
अस्थियां गंगा में प्रवाहित करते हैं, हर साल जाते हैं गया
झांसी। पंडित श्यामसुंदर बताते हैं कि वह जिस भी लावारिस और असहाय की लाश का अंतिम संस्कार करते हैं, उसकी अस्थियां घाट पर लॉकर में रख देते हैं। इसके बाद कई अस्थियां जमा होने पर उन्हें इलाहाबाद (प्रयागराज) ले जाकर गंगा में प्रवाहित करते हैं, यदि उन्हें समय नहीं मिलता तो किसी अन्य से सारी अस्थियां प्रयागराज में प्रवाहित कराते हैं। वह हर साल गया जी जाते हैं और वहां सभी लावारिस लाशों का पिंडदान कराते हैं।