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2022 तक बंद होगा पारीछा थर्मल पावर प्लांट!
- उत्पादन निगम के लिए महंगा पड़ रहा कम क्षमता की इकाइयों को चलाना
- छह में एक इकाई हो चुकी बंद, दूसरी मार्च 2019 में होगी
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
विद्युत उत्पादन निगम पारीछा थर्मल पावर प्लांट की सभी इकाइयां (यूनिट मशीन) 2022 तक बंद करने की तैयारी कर रहा है। इसके पीछे बड़ा कारण यूनिटों का पुराना होने के कारण और उत्पादन लागत बढ़ना है। दूसरा, बिजली कंपनियों द्वारा बड़े मेगावाट की इकाइयां (यूनिट) लगाने से सरकारी प्लांटों का उत्पादन महंगा पड़ने लगा है। इस कारण उत्तर प्रदेश विद्युत उत्पादन निगम (पावर सेक्टर) धीरे- धीरे अपने प्लांट बंद करने की तैयारी में लग गया है। पारीछा में अभी छह इकाइयों में 110 मेगावाट की एक इकाई बंद की जा चुकी है, जबकि, पावर सेक्टर ने 110 मेगावाट की दूसरी इकाई को मार्च 2019 तक बंद करने को कहा है।
उत्तर प्रदेश में अभी 20238 मेगावाट बिजली की मांग चल रही है। इसमें प्रदेश सरकार के पारीछा, ओबरा, पनकी, हरदुआ गंज और अनपरा पावर प्लांट से चार से साढ़े चार हजार मेगावाट की बिजली बन पा रही हैं। बाकी बिजली प्राइवेट कंपनियों और एनटीपीसी से खरीदी जा रही है। प्राइवेट कंपनियों ने 600 मेगावाट से अधिक की यूनिटें लगा रखी हैं, जिससे बिजली एक साथ बड़ी मांग उपलब्ध हो जाती हैं। नई मशीनें होने से से उत्पादन भी सस्ता पड़ रहा है।
यहीं कारण है कि पावर सेक्टर ने डिमांड कम बताकर अपनी पुरानी इकाइयों को बंद करने की तैयारी कर शुरू कर दी है। बताया गया है कि उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन करोड़ों रुपये के घाटे में चल रहा है। पुरानी इकाइयों की बिजली प्राइवेट कंपनियों से भी महंगी पड़ रही है। पुरानी उत्पादन इकाइयां आए दिन खराब हो जाती हैं। उनकी मरम्मत में बड़ी रकम खर्च होती है और इस दौरान उन्हें बंद करना पड़ता है। इसमें पारीछा थर्मल पावर प्लांट भी शामिल है। अभी पारीछा थर्मल पावर प्लांट में 110 मेगावाट की दो, 210 मेगावाट की दो और 250 मेगावाट की दो इकाइयां हैं। इनमें 110 मेगावाट की नंबर एक इकाई जुलाई 2016 से बंद है। दूसरी इकाई मार्च 2019 तक बंद करने की तैयारी है। सूत्रों की माने तो अन्य चार इकाइयां भी 2022 तक बंद कर दी जाएगी। अगर ऐसा होता है कि यहां के सरप्लस स्टाफ को दूसरी इकाइयों में शिफ्ट कर दिया जाएगा।
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बात सही है
हां, यह बात सही है कि पुरानी इकाइयों को 2022 तक बंद करने की कार्यवाही चल रही है, लेकिन इस पर अंतिम फैसला पावर सेक्टर को लेना है। मार्च 2019 से 110 मेगावाट की दूसरी इकाई को बंद करने के लिए कहा गया है।
ज्ञान प्रकाश वर्मा, मुख्य महाप्रबंधक, पारीछा थर्मल पावर प्लांट।
ये भी कारण
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- पुरानी मशीनों का रखरखाव बढ़ा।
- एश (राख) रखने के लिए नए डैम नहीं।
- मशीनों से पूर्ण क्षमता के साथ नहीं हो पाता उत्पादन।
- रांची, धनबाद से कोयला मंगाना पड़ रहा मंहगा।
- पर्यावरण के नियमों का पालन करना भी होता है मुश्किल।
आठ हजार लोगों को देता है रोजगार
पारीछा थर्मल पावर प्लांट से आठ हजार लोग परोक्ष और अपरोक्ष रूप से जुड़े हैं। प्लांट में 1400 कर्मचारी और अधिकारी तैनात हैं। बाकी ठेकेदार के मजदूर कोयले को भरने से लेकर मशीन के अंदर तक रखरखाव के काम में लगे हैं। आसपास के 12 गांव से अधिक में हर दूसरे परिवार का कोई न कोई सदस्य ठेकेदार के अंडर में काम करता है। बिहार के मजदूर बड़ी संख्या में यहां काम करते हैं। पारीछा का बाजार भी प्लांट में काम करने वाले लोगों से चलता है।
90 लाख की पड़ती है एक रैक
पारीछा थर्मल पावर प्लांट की सभी इकाइयों को चलाने के लिए प्रतिदिन चार से पांच मालगाड़ी (रैक) कोयले की आवश्यकता है। एक रैक में 3600 टन कोयला आता है, जो लगभग 90 लाख का पड़ता है। हर महीने पांच से छह लाख टन राख निकलती है, जिसमें अभी एक लाख टन की कंपनी और फैक्ट्री संचालक अपने उपयोग के लिए ले जा रहे हैं।
एनटीपीसी भी बंद करने जा रहा छोटी इकाइयां
नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन (एनटीपीसी) अलग-अलग स्थानों पर स्थापित अपनी दो सौ मेगावाट तक की 40 इकाइयों (मशीनों) को बंद करने जा रहा हैं। कारण यहीं है कि छोटी इकाइयों को चलाना महंगा साबित हो रहा है।
यह भी जानिए
प्रदेश में संचालित सभी इकाइयों की क्षमता लगभग सात हजार मेगावाट की है, जिसमें अभी चार से साढ़े चार हजार बिजली का उत्पादन हो रहा है। जबकि, मांग 20 हजार से अधिक मेगावाट की है। बाकी बिजली केंद्र से खरीदनी पड़ती है। हालांकि, इस मामले में ट्रांसमिशन अफसरों का कहना है कि कम क्षमता की इकाइयों को बंद करने से कोई खास असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि यहां के ग्रिड तंत्र के हिसाब से ललितपुर के बजाज पावर प्लांट ने इस कमी को पूरा कर दिया है।