ऊं नमो भगवते वासुदेवाय थे वीरांगना के अंतिम शब्द
डा. रुद्र पांडेय की पुस्तक ‘झांसी’ में किया गया दावा
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
‘ऊं नमो भगवते वासुदेवाय’ विष्णु भगवान का यह मंत्र वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के अंतिम शब्द थे। यह दावा झांसी के पुरातत्व विभाग में कार्यरत रहे डा. रुद्र पांडेय की किताब ‘झांसी’ में किया गया है।
ग्वालियर में अंग्रेेजों की आठवीं हुसार्स सेना और रानी लक्ष्मीबाई व उनके सैनिकों के मध्य घनघोर युद्ध हुआ। डा. रुद्र पांडेय की पुस्तक ‘झांसी’ के अनुसार रानी का नया घोड़ा स्वर्ण रेखा नदी को पार नहीं कर सका। इसी वक्त उनकी बाईं जांघ में गोली लगी। इसके बावजूद उन्होंने बाएं हाथ से तलवार चलाकर शत्रु सैनिक को मार गिराया। एक हुसार्स सैनिक ने रानी के माथे पर तलवार मारी, इससे उनका सिर नेत्र तक चिर गया। तेजी से खून बहने लगा। लेकिन रानी ने गिरते-गिरते एक बार फिर अपने पराक्रम का परिचय देकर उस सैनिक का कंधा काट डाला। इस वक्त रानी के पठान सरदार गुल मोहम्मद ने उस हुसार्स सैनिक का वध कर दिया।
रानी के अन्य सरदार रामचंद्र देशमुख व दीवान रघुनाथ सिंह हुसार्स सैनिकों पर टूट पडे़। ऐसे में हुसार्स सैनिक भाग खडे़ हुए। इसके बाद घायल रानी को उनके सरदार समीप में साधू गंगादास की कुटी में ले गए। साधू गंगादास ने उनके मुंह में पवित्र गंगाजल दिया। रानी ने बेहद धीमे स्वर में ऊं नमो भगवते वासुदेवाय बोला और वीरगति प्राप्त की। यहीं दुखी सरदारों ने अपनी स्वामिनी का अंतिम संस्कार कर रानी की इच्छा का पालन किया कि अंग्रेज उनके शव को छू न सकें।
यहां भी है वर्णन
रानी की शहादत और उनके अंतिम शब्दों का जिक्र द रानी ऑफ झांसी, बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई आदि पुस्तकों में भी है। साथ ही अमृत बाजार पत्रिका के 15 अगस्त 1957 के अंक में रानी के भाई चिंतामन राव तांबे की पौत्री यमुना शास्त्री के लेख में भी इसका वर्णन किया गया है।