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मिट रहे हैं बुंदेलखंड कलम शैली के दुर्लभ चित्र
शहर के गोसाईं मंदिरों व मठों में बनी इन कलाकृतियों का नहीं हो रहा संरक्षण
पेड़ों की छाल से तैयार किए गए थे, गोमूत्र से इनका रंग गहरा किया जाता था
सामजय नायक
झांसी।
शहर के गोसाईं मंदिरों व मठों में बने दुर्लभ प्राचीन भित्ति चित्र संरक्षण के अभाव में मिटने की कगार पर हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह चित्र पेड़ों की छाल से तैयार किए गए थे। इन्हें गोशालाओं में दबाया जाता था। गोमूत्र से इनके रंग गहरे हो जाते थे। चित्रकारों ने राजसी जीवन के ठाठ और सजे संवरे पशु-पक्षियों को बुंदेली कलम शैली से बेहद आकर्षक ढंग से उकेरा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस संबंध में सरकारी संस्थाओं को कई बार सूचित किया। इसके बावजूद किसी ने ध्यान नहीं दिया।
16 वीं और 17 वीं सदी के मध्य झांसी नगर का विकास तेजी से हुआ। शिव भक्त गोसाईं संप्रदाय के साधुओं ने इस दौर में जगह-जगह मठ और मंदिर बनवाए। इनमें कई मठ ऐसे भी हैं, जिनमें साधुओं ने जीवित समाधि ली थी। इन्हीं में शामिल हैं सुरैंयों के बाग में बने मठ। बेहद पतली गलियों में मौजूद इन दो मठों के गर्भगृह में कई रंग- बिरंगे चित्र हैं, जिनमें अधिकतर लाल व हरे रंगे के हैं। चित्रों में बेलबूटे और फुलवारी तो हैं ही, हाथी और घोड़े पर बैठे राजा और सैनिक भी हैं।
सजी संवरी महिलाओं के अलावा चक्की चलाती स्त्रियां, मदारी, हाथियों पर बैठे राजा और योद्धाओं के साथ शिकार के दृश्य भी उकेरे गए हैं, लेकिन इन चित्रों का हाल यह है कि इन्हें जानने व पूछने वाला कोई नहीं है। उपेक्षित होने के कारण इन चित्रों के रंग भी लोगों के इंतजार में सूखते जा रहे हैं। प्लास्टर उखड़ रहे हैं। इन मंदिरों की देखरेख करने वाले बृजलाल प्रजापति और विशाल प्रजापति ने बताया कि सरकारी संस्थाओं को कई बार जानकारी दी। कु छ लोग आए भी, लेकिन इसके आगे कुछ नहीं हुआ।
चित्र बनाने की कई तकनीक थीं प्रचलन में
16 वीं और 17 वीं शताब्दी में चित्र बनाने की क ई तकनीक अपनायी जाती थीं। इनमें चिकनी सतह पर तूलिका से चित्रांकन काफी लोकप्रिय था। इसके अलावा सतह पर चूने के मोटे प्लास्टर को जमाकर उस पर चित्रण किया जाता था। यह चित्र रानी महल, महाराजा गंगाधर राव की समाधि पर बने हैं। गोसाईं मंदिरों में लकड़ी की वसली और गर्भगृह के ऊपरी हिस्से में चित्र बने हैं।
मराठा राजाओं के बनते थे चित्र
शहर के मंदिरों में देवताओं के अलावा मराठा राजाओं के चित्र भी बनते थे। शहर में पसरट की गली में स्थित श्रीरघुनाथ जी के मंदिर में महाराजा गंगाधर राव, महारानी लक्ष्मीबाई और मराठा राजाओं के दरबार के चित्र थे। इनका उल्लेख क ई इतिहासकारों ने अपनी पुस्तकों में किया है।
संरक्षण के बाद भी मिट रहे हैं चित्र
उधर, भारत सरकार के संरक्षण के बाद भी रानी महल के चित्रों के रंग मिटते जा रहे हैं। यह चित्र 17 वीं सदी के बने हैं। हालांकि पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का कहना है कि इन चित्रों को संवारने के लिए लगभग 20 लाख रुपये खर्च किये जाएंगे।
चित्रों का सर्वे होगा
जल्द ही गोसाईं मंदिरों में बने चित्रों का सर्वे कार्य शुरू करेंगे, ताकि यह संरक्षित हो सकें। यह चित्र बुंदेली कलम शैली में बने हैं। अभी तक सीमित संसाधनों के अभाव में इन चित्रों को संरक्षण में नहीं लिया जा सका है।
- डॉ. एसके दुबे, पुरातत्व अधिकारी
बुंदेली कलम शैली में बने चित्र
बुंदेलखंड की चित्रकला में चितेरी और बुंदेली कलम शैली का प्रयोग होता रहा है। गोसाईं मंदिरों में बने चित्र बुंदेली कलम शैली के हैं, जो प्राकृतिक रंगों यानि पेड़ों की छाल से तैयार किए गए थे। इन्हें गोशालाओं में दबाया जाता था। गोमूत्र से यह रंग गहरे हो जाते थे।
- मुकुंद महरोत्रा झांसी के इतिहास के जानकार
शोध शरू कराएंगे
बुंदेली लोक चित्रकला चितेरी है। इस पर कई शोध हुए हैं, लेकिन जल्द ही विद्यार्थियों को गोसाईंयों के मंदिरों में बने चित्रों को भी दिखाया जाएगा। इन पर शोध शुरू कराएंगे।
- डॉ. श्वेता पांडेय, विभागाध्यक्ष ललित कला संस्थान बुंदेलखंड विश्वविद्यालय