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सता संग्राम: भागीरथ चौधरी

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जनता ने ही चंदा करके लड़ाया था भागीरथ को चुनाव
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- मऊरानीपुर क्षेत्र में जलाई थी शिक्षा की ज्योति

अमर उजाला ब्यूरो

बस ‘राजनीति’ शब्द ही नहीं बदला, बाकी इससे जुड़ी सारी चीजें बदल चुकी हैं। खासतौर पर नेताओं में बड़ा बदलाव आया है। देशहित से शुरू हुई वर्तमान राजनीति अब नेताओं की स्वार्थ सिद्धि के पड़ाव तक पहुंच चुकी है। उनके कामकाज का तरीका बदल गया है, चुनाव के पहले तक जनता के बीच में रहने वाले नेता पद मिलते ही दूरी बना लेेते हैं। हालांकि, लोगों के दिलों से उतरने में इन्हें वक्त भी नहीं लगता है। जबकि, पुरानी पीढ़ी के तमाम नेता अपनी मृत्यु के कई-कई दशकों बाद भी लोगों के दिलों में बैठे हुए हैं। इन्हीं में से एक हैं मऊरानीपुर नगर सीट से दो बार विधायक रहे भागीरथ चौधरी। वे तो अब नहीं हैं, लेकिन, उन्हें लोग आज भी याद करते हैं। जनता ने ही उन्हें चंदा करके चुनाव लड़ाया था।

झांसी।
वोटों के लिए नोट बांटने वाले नेताओं के दौर में अगर किसी से कहा जाए कि एक विधायक झांसी जिले में ऐसे भी बने, जिन्हें जनता ने चंदा देकर चुनाव लड़ाया हो तो शायद लोग यकीन नहीं करें। लेकिन, यह सच है। मऊरानीपुर के बेरबई गांव के निवासी भागीरथ चौधरी को जनता ने ही चंदा करके चुनाव लड़ाया और दो बार मऊरानीपुर से विधानसभा पहुंचाया। भागीरथ चौधरी खुद तो कक्षा आठ तक पढ़े थे, लेकिन शिक्षा का महत्व भलीभांति समझते थे। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कई स्कूलों का निर्माण कराया। साथ ही पथरई, कुढ़ार व सिजार बांध स्वीकृत कराने के लिए भागीरथी प्रयास किए। उनके प्रयासों को आज तक क्षेत्र के लोग नहीं भूले हैं।
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ठेठ गांव के भागीरथ चौधरी शुरू से ही जनता की सेवा करने लगे थे। धीरे-धीरे लोग उनसे जुड़ते गए। उस समय कांग्रेस का दौर था। उनकी लोकप्रियता को देखकर कांग्रेस ने उन्हें 1977 में टिकट दिया। इस चुनाव में उन्हें 28,665 वोट मिले थे। जनता पार्टी के प्रत्याशी प्रेमनारायण 29,453 वोट लेकर 788 मतों से विजयी हुए। चूंकि प्रेमनारायण 1969 में भी विधायक रहे थे, उनके मुकाबले में महज 788 वोटों की हार के बाद भी भागीरथ का कद क्षेत्र में स्वत: बढ़ गया था। हाथ में पैसे नहीं थे, लेकिन मन में उत्साह बहुत था।
क्षेत्र के लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए वह लगातार प्रयासरत रहे। इसी दौरान इंदिरा गांधी के आह्वान पर जेल भरो आंदोलन में वह 19 दिसंबर 1978 से 27 दिसंबर 1978 तक जेल मेें रहे। इसके बाद 1980 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर उन पर विश्वास जताया। जेब में धेला नहीं था, लेकिन उनकी सादगी के कारण क्षेत्र के लोगों और पार्टी ने दिल खोलकर चंदा दिया। उन्होंने पूरे दमखम के साथ चुनाव लड़ा। भागीरथ ने 33,660 वोट लेकर भाजपा के हरदास को हराया। हरदास को मात्र 12963 वोट मिले। इसी तरह 1985 के विधानसभा चुनाव में भी उनको सफलता मिली। इस चुनाव में उनको 29400 वोट मिले और दूसरे नंबर पर रहे प्रेमनारायण को 18956 वोट पर संतोष करना पड़ा। 1989 के चुनाव में उनको 34659 वोट मिले, लेकिन भाजपा प्रत्याशी प्रागीलाल अहिरवार को उनसे अधिक वोट मिले। इस बार उनको हार का सामना करना पड़ा। 2004 में उन्होंने अंतिम सांस ली।

ये रहीं उपलब्धियां
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- मऊरानीपुर, सकरार और कटेरा में राजकीय इंटर कॉलेज स्वीकृत कराए।
- पथरई, सिजार और कुढ़ार नदियों पर बांध स्वीकृत कराकर सिंचाई की समस्या का समाधान कराया।
- मऊरानीपुर- गुरसराय रोड पर ऊबड़ खाबड़ भूमि को समतल कराकर औद्योगिक आस्थान स्वीकृत कराया।
- शासन से क्षेत्र में 113 स्कूल स्वीकृत कराए।
- प्राथमिक अस्पताल को सीएचसी के रूप में स्वीकृत कराकर अपने ही कार्यकाल में स्थापित कराया।

उनके रोने पर भावुक हो गई थीं मंत्री
कक्षा आठ तक पढ़े भागीरथ चौधरी शिक्षा के महत्व से भलीभांति परिचित थे। इस कारण वह अपने क्षेत्र के शैक्षिक विकास के लिए प्रयत्नशील रहते थे। उन्होंने कई बार स्कूलों के लिए प्रस्ताव भेजे, लेकिन स्वीकृति नहीं मिली। इस पर तत्कालीन शिक्षा मंत्री स्वरूप कुमारी बख्शी से मिलने 30 सितंबर 1982 को लखनऊ पहुंचे। मंत्री से सकारात्मक जवाब न मिलने पर उनके सामने फूट- फूट कर रोने लगे। इस पर मंत्री भावुक हो र्गइं और स्कूलों को स्वीकृति दे दी। ये घटना एक अक्तूबर 1982 को लखनऊ के हर अखबार की सुर्खी बनी थी।
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भूसा बेचकर पालते थे परिवार
भागीरथ चौधरी के पास खेती के नाम पर थोड़ी सी जमीन थी। वह भूसा बेचकर अपना परिवार पालते थे। नीचे बैठकर लोगों से बात करना उनकी आदत थी। रास्ते चलते लोगों को सुनना और उनके काम कराना उनकी दिनचर्या में शामिल था। क्षेत्र के विकास कार्य स्वीकृत कराने के लिए वह मंत्रियों के पैर पकड़ने से भी नहीं हिचकते थे। अपने सादगी भरे जीवन और विकास की सोच के कारण लोग उन्हें आज भी याद रखते हैं।
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